#जीवनसंवाद: मन के दस्तावेज़!

#जीवनसंवाद: मन के दस्तावेज़!
जीवन संवाद

jeevan samvad: जीवन में कई बार हम न चाहते हुए भी आंधियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं. सोचते हैं कि कुछ ऐसा घट जाए जिससे हमारा जीवन बड़ी तेजी से बदल जाए. जबकि तेजी से तो कुछ नहीं बदलता. तेजी से केवल विध्वंस होता है. मिटाया तो तेज़ी से जा सकता है लेकिन बनाने में तो वक्त ही लगता है.

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हमारी चीज़ों को सहेजने की पुरानी आदत है. लेकिन ऐसा करते हुए हम गैर जरूरी कचरा इकट्ठा करते रहते हैं. कुछ बरस बाद हम पाते हैं कि हमारे पास कागजों का कबाड़ खड़ा हो गया. फिर उसकी साफ़ सफाई में जुटते हैं, यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. कुछ चीजें ऐसी भी होती हैं जो जरूरी तो नहीं होतीं लेकिन उनसे हमारे मोह के धागे जुड़े होते हैं. हम उन्हें हर हाल में संभाले रखते हैं. ऐसा ही मन के साथ है!

कागज़ का कचरा तो हमको दिख भी जाता है लेकिन मन में गैर जरूरी चीजों का इकट्ठा होते रहना कभी नजर नहीं आता. हम हर अनुभव को मन में दर्ज करते हैं. मन से इनको मिटाने की कोई प्रक्रिया नहीं है. हर अनुभव मन में दर्ज होते रहने से मन में ऐसे अनुभवों की बाढ़ आ जाती है, जिनमें दर्द की छाप है. प्रेम पीछे छूटता जाता है. जीवन इतना अधिक अंधेरे की ओर दौड़ रहा है कि हम उसमें से स्नेह और प्रेम का उजाला नहीं ले पा रहे.

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इसलिए छोटा-सा प्रयोग कीजिए. सुबह सोकर उठने के बाद यह देखिए कि कल की कितनी चीज़ें याद हैं. थोड़ी सजगता से देखने पर आप पाएंगे कि कल की याद में से कोमलता और प्रेम का स्पर्श बासी हो जाता है. हम केवल कमी और दोष को ही याद रखते हैं. जबकि ऐसा संभव नहीं है कि किसी पूरे एक दिन प्रसन्नता की एक लहर भी हमारी ओर न आई हो. खुशी का एक झोंका ही सही, लेकिन दिन भर में किसी न किसी रूप में हमारे पास आता ही है.

हमारा उसे सहेजने का अभ्यास नहीं है. हम प्रेम और स्नेह की छोटी-छोटी बूंदों को यूं ही गुजर जाने देते हैं. जबकि हमारे झुलसे हुए मन को सबसे अधिक राहत प्रेम के छोटे-छोटे अवसर ही प्रदान करते हैं. प्रेम कभी भी जीवन में बाढ़ की तरह नहीं आता है. उसकी प्रकृति धीमे चलने की है. जैसे शीतल हवा धीरे-धीरे चलती है. तूफानी गति से तो आंधियां चलती है, जिनका कुछ भी हासिल नहीं होता.


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जीवन में कई बार हम न चाहते हुए भी आंधियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं. हम सोचते रहते हैं कि कुछ ऐसा घट जाए जिससे हमारा जीवन बड़ी तेजी से बदल जाए. जबकि तेजी से तो कुछ नहीं बदलता. तेजी से केवल विध्वंस होता है. मिटाया तो तेज़ी से जा सकता है लेकिन बनाने में तो वक्त ही लगता है.


इसलिए तेजी से भागती जिंदगी की गति कुछ धीमी करने की कोशिश कीजिए. थोड़ा ठहरने और धीमे चलने की कोशिश कीजिए. कोशिश कीजिए कि बेकार के अनुभव दिमाग़ से बाहर रहें. दिमाग में कचरा कम से कम इकट्ठा हो. इसके लिए जरूरी है कि दिमाग की स्कैनिंग सजगता पूर्वक की जाए. इससे जीवन के सही अर्थ को उपलब्ध होने और सहज बने रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. शुभकामना सहित...
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