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#जीवनसंवाद: टूटे हुए रिश्‍तों के उस ‘पार’...

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 8, 2019, 9:24 AM IST
#जीवनसंवाद: टूटे हुए रिश्‍तों के उस ‘पार’...
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अनुभव के पार जाकर दुनिया को जीने, समझने, स्‍नेह करने का हुनर कम लोगों के पास है. इसे जीवन के प्रति गहरी आस्‍था, स्‍नेह से ही बुनना संभव है.

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  • Last Updated: November 8, 2019, 9:24 AM IST
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हम सब अपने-अपने अनुभव की रची दुनिया में ही जीते हैं. जिसके अनुभव जैसे रहे, वह अपने को उसके अनुसार बनाता गया. अपने अनुभव के पार जाकर दुनिया को जीने, समझने, स्‍नेह करने का हुनर कम लोगों के पास है. इसे जीवन के प्रति गहरी आस्‍था, स्‍नेह से ही बुनना संभव है. इस संवाद को टूटे हुए रिश्‍तों, मन में कटुता, बहुत कोशिश के बाद भी चीजों को नहीं सुझाने के विशेष संदर्भ में लिया जाना चाहिए.

जिंदगी में प्रेरणा के फूलों की खूशबू हम दूसरों को खूब बांटते रहते हैं, लेकिन अपने जीवन से इसे अनजाने ही दूर रखते हैं. जिंदगी रुकने का नाम नहीं, अनुभव के तट पर उसे बंधक नहीं बनाना है.

जयपुर से जीवन संवाद की नियमित पाठक रुचिरा त्रिपाठी ने लिखा है, ‘मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जहां माता-पिता को मैंने झगड़ते ही पाया. इससे मन में विवाह के प्रति एक तरह की अरुचि विकसित होती गई. उसके बाद बड़ी बहन के दांपत्‍य जीवन में भी अनेक मुश्किलें देखी. जब तक विकास (उनके पति) से मिलना नहीं हुआ, जीवन आशंका के बीच डूबता-उतरता रहा. रुचिरा का कहना है कि दूसरे रिश्‍तों से सीख लेना चाहिए, लेकिन उनके आधार पर अपने लिए कोई नियम नहीं बनाए जा सकते. हर कोई स्‍वतंत्र है, इसलिए उसके व्‍यवहार को दूसरे से नहीं जोड़ा जा सकता.’

इस अनुभव को समाज से जोड़ने पर आप देखेंगे कि बड़ी संख्‍या में हमने अपना जीवन दूसरों के अनुभव के सहारे मझधार में छोड़ रखा है. दूसरों के टूटे दिलों, रिश्‍तों के आधार पर आप अपने लिए कुछ हद तक सबक तो ले सकते हैं, लेकिन उनको जीवन का सूत्रधार नहीं बनाया जा सकता.


अब टूटे रिश्‍तों से पार जाने की बात.

जीवन अनंत संभावना है. उसे कुछ खराब, अनुचित मिलन के आधार पर मत बांधिए. हो सकता है कि किसी वजह से दो लोग किसी रिश्‍ते में न बंध पाए हों लेकिन इसके मायने यह नहीं कि वह किसी नए रिश्‍ते में भी ऐसे ही साबित हों.

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जिंदगी को रिश्‍तों के अनसुलझे भंवर से बचाना है. जो हो गया, उससे बाहर आने में समय तो लगेगा. लेकिन कितना, कब तक. जीवन प्री-पेड सिम की तरह है. इसमें कुछ अपवादों को छोड़कर हर मिनट का हिसाब है. इसलिए, अनसुलझे रिश्‍तों के मांझे वक्‍त रहिए सुलझाइए, अगर ईमानदार कोशिश भी असर न दिखा सके, तो उससे बाहर आ जाइए.

अनसुलझे, रिश्‍तों के चक्रव्‍यूह में उलझे मत रहिए. कुंठा को अपने पैर पसारने से रोकिए. मन पर तनाव को घोसला बनाने से रोकने का सबसे सुंदर रास्‍ता, अपनी पगडंडी बना लेना है. नई राह पकड़ लेना है.


जीवन तट पर इस पार जो हुआ तो हुआ. उस पार आशंका को लेकर मत टहलिए. एक रिश्‍ता टूटा कोई बात नहीं. दूसरे में धोखा मिला, कोई बात नहीं. बहुत संभव है कि आप कुल जमा पांच लोगों से ही घिरे रहे हों. कम लोगों के बीच रहने से हमारी दुनिया छोटी ही रहेगी. अपनी दुनिया को बड़ा कर लेने से उसके किरदार अपने पास बढ़ जाएंगे.

इस ब्रह्मांड में धरती, हमारी मां की बिंदी से बड़ी नहीं है. ऐसे में आपकी दुनिया कितनी छोटी है,सहज समझ सकते हैं. इस दुनिया को बड़ा कीजिए. अधूरे रिश्‍तों को छोड़ कर, ‘उस’ पार जाने की तैयारी कीजिए. उस पर जाने से डरिए नहीं. अनुभव हमेशा तट पर रुके रहने से श्रेष्‍ठ होता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 7, 2019, 12:03 PM IST
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