#जीवन संवाद: मन के टूटे तार!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 3, 2019, 12:52 PM IST
#जीवन संवाद: मन के टूटे तार!
जीवन संवाद

हमारा मन जैसा है, हम धीरे-धीरे वैसे ही होते जाते हैं. इसलिए मन का निर्माण बहुत सजगता से करने की जरूरत है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 3, 2019, 12:52 PM IST
  • Share this:
कभी जुलाहे को कपड़ा बुनते देखिए? कठिन काम को कितनी सरलता से करता है. कहीं गठान दिखती ही नहीं. जबकि धागों का टूटना टाला नहीं जा सकता. दूसरी ओर हम हैं कि अपने मन के तारों को सुलझा ही नहीं पाते. सुलझाते भी हैं तो जगह-जगह पड़ी गठानें मानो खराश बनकर हमें सताती रहती हैं. काश हम जुलाहे से सीख पाते कि मन के तारों को कैसे सुलझाएं और जरूरत पड़ने पर गठान कैसे लगानी हैं.

जीवन में कुछ भी सरल नहीं है. कुछ भी कठिन नहीं है. कुछ दिन पहले मैं एक ऐसे 'जीवन संवाद' का हिस्सा था, जिसमें अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ प्रतिभागी के रूप में शामिल थे. एक कुशल रसोइए ने पर्वतारोही से पूछा, 'कितना मुश्किल काम है आपका पहाड़ों को पार करना. पथरीली राहों के भंवर में आपको घर लेती चट्टानों से गुजरना, खुद को बचाए रखना और दूसरों की मदद भी करते रहना.'

#जीवन संवाद: दुख संभालने की कला!

पर्वतारोही ने मुस्कुराते हुए कहा, 'आपकी तुलना में सरल है. इतने सारे अलग-अलग लोगों की रुचि के अनुकूल एक साथ मुश्किल स्वाद को साधना. मसालों को साधना सरल नहीं है. जब तक पकवान में आत्मा का स्वाद ना मिलाया जाए. भोजन स्वादिष्ट हो ही नहीं सकता.'

जिंदगी इसी तरह चलती रहती है. हम दूसरों को देख कर जीते रहते हैं. मन में अधूरी लालसा को लिए हुए. तो दूसरे हमें देख कर जीवन को हौसला देते रहते हैं.




लेकिन इस बीच सबसे जरूरी होता है मन के टूटे तारों को संभालना. जिंदगी में ऐसे मौके आते ही रहते हैं, दूसरों की बातों से सहज ही व्यथित और परेशान होने लगते हैं. पिछले अंक में हमने लिखा था, स्वयं को दुखी करने की इजाजत दूसरों को नहीं देना. इस पर हमें बड़ी संख्या में आपकी प्रतिक्रिया मिली है.
Loading...

कुछ पाठक इसे असंभव बता रहे हैं. कुछ का मानना है कि ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है. मैं दोनों चीजों के बीच में चलने की सलाह दूंगा. हम जो कुछ भी हैं उसके पीछे केवल एक मन है. जो कभी पर्वत की तरह ठोस होकर जीवन की जटिलता को सह लेता है तो दूसरे ही पल फूलों की तरह नाजुक होकर बिखर जाता है.

#जीवन संवाद : जब 'कड़वा' ज्यादा हो जाए!
‌‌‌
मन को संभालना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. आपने सुना होगा हम अक्सर बात करते हैं, वह बहुत भावुक हैं! वह बहुत ही कठोर हैं. वह बहुत ही सरल हैं. जबकि सबके शरीर उनके बताए गए स्वभाव की तुलना में बहुत ही प्रतिकूल होते हैं. असल में हमारा मन जैसा है, हम धीरे-धीरे वैसे ही होते जाते हैं. इसलिए मन का निर्माण बहुत सजगता से करने की जरूरत है.

जीवन को किसी कथा, कहानी, सिनेमा की तरह समझने की जगह यथार्थ रूप में समझना होगा. पहले हम अपने मन का निर्माण करते हैं, फिर उसके बाद धीरे-धीरे मन हमारा निर्माण करने लगता है. हमें पता ही नहीं चलता हम परिस्थितियों का सामना अपने अनुसार न करने की जगह मन के अनुसार करने लगते हैं.


ऐसे में सहज है कि मन में गांठें पड़ जाएं. उलझन के भंवर आपको घेर लें. मन अनजाने ही अनेक बार ईर्ष्या, दुविधा और शंका की ओर ले जाता है. क्योंकि आपने अनजाने ही उसे इन पगडंडियों का रास्ता बता दिया था. इसलिए जैसे आप अपनी गाड़ी की सर्विसिंग समय पर कराते हैं. उसके ग्रीस और ऑयल का ध्यान रखते हैं. अपने मन की सर्विसिंग का भी खयाल रखिए. आपका इस लेख को पढ़ना यह बताता है कि आप जीवन के प्रति सजग, सुचिंतित हैं. इसे बनाए रखिए, मन के प्रति सजग बनिए! इससे उलझे तार सरलता से सुलझ सकते हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

#जीवन संवाद: रिश्ते में श्रेष्ठता का पेंच!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 3, 2019, 8:26 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...