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#जीवनसंवाद: एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता...

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 21, 2019, 5:13 PM IST
#जीवनसंवाद: एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता...
#जीवनसंवाद: एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता...

Jeevan Samvad: थोड़ा पीछे जाइए. जब तकनीक प्रबल नहीं थी. हम गहराई से एक-दूसरे से जुड़े थे. परस्‍पर सहयोग, आंसू पोंछने की क्षमता कहीं अधिक थी. स्‍नेह का बंधन उस वक्‍त सबसे जरूरी होता है, जब संकट के बादल मन, आत्‍मा पर मंडरा रहे हों.

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  • Last Updated: November 21, 2019, 5:13 PM IST
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तकनीक का साथ बढ़ने के साथ ही हम मनुष्‍य के रूप में एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता खोते जा रहे हैं. एक-दूसरे से जुड़ने का अर्थ है, गहरा स्‍नेह, आत्‍मीयता. बिना कहे सुख-दुख की परस्‍पर अनुभूति! जिंदगी में मनुष्‍य की हिस्‍सेदारी गहरी से हल्‍की होती जा रही है. अब हम जुटने (भीड़) के लिए तकनीक का सहारा अधिक लेते हैं, जुड़ने (साथ) के लिए कम. जुटने से अर्थ हुआ कि किसी संकट विशेष में हम पहले के मुकाबले थोड़ी सुविधा से मिल रहे हैं. जब तक सोशल मीडिया, तकनीक नहीं थी, उस समय भी हम जुटने में पीछे रहने वाले समाज नहीं थे. हां, अब यह थोड़ा आसान जरूर हुआ है. लेकिन इससे अधिक नुकसान हो रहा है. तकनीक हमें अलग-अलग करने में सफल हो गई.

अब हर किसी के लिए प्रतिक्रिया देना, अपनी बात कहना इतना अधिक आसान हो गया कि रिश्तों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती बन गई. देश में जिस तेजी से आत्‍महत्‍या, तनाव और निराशा मन में गहरा रही है, उसे अगर हम जुड़ने की कला में आई कमी से जोड़ पाएं, तो संभव है हम संकट को सरलता से समझ सकें.

अब तो स्थिति यह है कि हम अपने भाई, परिवार और सहकर्मी तक से नहीं जुड़ पा रहे हैं. सहकर्मी को इसलिए शामिल किया, क्‍योंकि वह भी आपके बड़े परिवार का ही हिस्‍सा है. उसके साथ हम इतना अधिक समय बिता देते हैं कि खुद को उससे अलग रख पाना संभव नहीं होता.


एक सरल उदाहरण से समझते हैं. आज से दस बरस पहले अगर पति-पत्‍नी, रिश्‍तेदारों के बीच अनबन होती, तो कुछ दिन/घंटे बाद धीरे-धीरे उसे सुलझा लिया जाता. ऐसा करना कहीं अधिक आसान होता था.

अब सबकुछ उल्‍टा हो गया है. पति-पत्‍नी और मित्र नाराज होते ही सबसे पहले सोशल मीडिया, तकनीक के आंगन में टहलने जाते हैं. एक-दूसरे को इतनी जल्‍दी व्‍हाट्सअप, एसएसएस कर दिए जाते हैं कि मन की ‘दूरी’ कहीं से कहीं पहुंच जाती है. झगड़ा किसी बात से शुरू हुआ था, वह कहां तक पहुंच गया. समझना मुश्किल हो जाता है.


माफ कीजिए, इसका शिक्षि‍त होने से कोई संबंध नहीं. शिक्षित व्‍यक्ति की परिभाषा पर हम कभी बात में बात करेंगे. आज बस इतना कि अगर कोई व्‍यक्ति उस बात को जो कही जा रही है, वह न समझकर किसी दूसरी दिशा में चला जाए, तो इसे शिक्षित होना नहीं कहा जाएगा.
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तकनीक, स्‍मार्टफोन ने हमारी एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता को कुछ वैसा ही प्रभावित किया है, जैसे दिल्‍ली की जहरीली हवा धीरे-धीरे हमारी सांसों में घुल रही है. यह काम इतनी बारीकी, धीमी गति से हो रहा है कि अभी किसी को शरीर की चिंता नहीं सता रही.


थोड़ा पीछे जाइए. जब तकनीक प्रबल नहीं थी. हम गहराई से एक-दूसरे से जुड़े थे. परस्‍पर सहयोग, आंसू पोंछने की क्षमता कहीं अधिक थी. स्‍नेह का बंधन उस वक्‍त सबसे जरूरी होता है, जब संकट के बादल मन, आत्‍मा पर मंडरा रहे हों.

इसलिए, हमको अपने-अपने का कोटा तय करना होगा. रिश्‍तों को केवल तकनीक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. एक-दूसरे से मिलना, मिलकर सुख-दुख बांटने का कोई विकल्‍प नहीं है. ऐसे संबंधों के लिए समय निकालिए, जिनके बिना आप जिंदगी की कल्‍पना करने से डरते हैं. उनका ख्‍याल रखने का अर्थ केवल उनके हिस्‍से के पैसे जुटाना ही नहीं है. भावनात्‍मक सुख के पौधे का ख्‍याल भी इतने ही प्रेम से रखना होगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 21, 2019, 12:05 PM IST
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