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#जीवनसंवाद: प्रेम, निर्णय और नाराजगी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 1, 2019, 4:50 PM IST
#जीवनसंवाद: प्रेम, निर्णय और नाराजगी!
हमारे समाज में आज्ञा को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि उसमें स्वतंत्र निर्णय का अक्सर खयाल नहीं रखा जाता.

Jeevan Samvad: माता-पिता की ओर हमें प्रेम की खिड़कियां हमेशा खुली रखनी होंगी. असहमति के बाद भी, नाराज होने का हक उन्हें देना ही होगा.

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  • Last Updated: November 1, 2019, 4:50 PM IST
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हम प्रेम और निर्णय को अक्सर एक-दूसरे में मिलाते रहते हैं. एक-दूसरे से असहमत होने का अर्थ, प्रेम में कमी नहीं है. अपनी-अपनी दुनिया बड़ी होने के साथ हमारे नजरिए, दृष्टिकोण में भिन्नता स्वाभाविक है. इसे प्रेम से जोड़ना सहज नहीं है.

भोपाल से 'जीवन संवाद' के सुधि पाठक अजय दुबे लिखते हैं, 'मैंने पिताजी के अनुसार अपना कैरियर नहीं चुना. विवाह भी मैंने उनकी पसंद के अनुरूप नहीं किया. इससे उनके-मेरे बीच दीवार खड़ी हो गई. हम सब एक ही बड़े घर में रहते हैं, हमारे मन के बीच लंबी-चौड़ी खाई है. हम दोनों के बीच पांच बरस से बातचीत, संवाद बंद है.'

हमारे समाज में आज्ञा को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि उसमें स्वतंत्र निर्णय का अक्सर खयाल नहीं रखा जाता. यही वजह है कि हम बदलते समय, समाज के अनुरूप अपने घर परिवार को 'सहज' नहीं रख पा रहे.


वह भी एक जमाना था जब, पिता ही परिवार के लिए दुनिया की खिड़की हुआ करते थे. इंटरनेट, मीडिया के आगमन से यह पूरी व्यवस्था ही बदल गई. हम ऐसे समय में पहुंच गए जहां बच्चों, किशोर, युवा के पास विज्ञान और तकनीक से जुड़ी जानकारी किसी को भी अचंभित कर सकती है. तकनीकी स्तर पर पूरी दुनिया एक गांव जैसी हो गई है. इससे असहमति का उपजना स्वाभाविक है.

माता-पिता बच्चों को लेकर इतने अधिक भावुक, अधिकारवादी हैं कि वह उनके हर निर्णय में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं. रिश्तों के बीच तनाव का यह बड़ा कारण है. हमें यह समझना होगा कि हर किसी के सपने निजी, अपने हैं. मैं बड़ी संख्या में ऐसे माता-पिता से परिचित हूं, जिन्होंने अपने निर्णय खुद लिए, अपने माता-पिता से विद्रोह करके. लेकिन अपने बच्चों के लिए वह एकदम कठोर हो जाते हैं. उन्हें यही लगता है कि बच्चों के निर्णय वही बेहतर कर सकते हैं.



प्रेम और निर्णय के बीच यह घुमावदार मोड़ ही तनाव का सबसे बड़ा कारण है. आइए, लौटते हैं अजय दुबे के प्रश्न की ओर. अगर माता-पिता किसी वजह से नाराज हैं, अपनी ओर से संवाद स्थगित कर दिया है तो भी कोशिश बंद नहीं करनी है. अंततः हैं तो वह माता-पिता ही.

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उनका कोई विकल्प नहीं है. हमारे लिए उनसे बढ़कर किसी के मन में भी प्रेम नहीं है. इसलिए हमें प्रेम की खिड़कियां उनकी और खुली रखनी होंगी. नाराज होने का हक उन्हें देना ही होगा. नाराजगी को प्रेम से अलग रखना होगा. यह जीवन की बहुत सरल सहज सीख है, मेरे जीवन में ऐसे अनेक लोग हैं, जिनसे निर्णय के स्तर पर असहमति है, लेकिन हमने उसे कभी प्रेम की रुकावट नहीं बनने दिया. इसे प्रयोग की तरह करके देखिए. यह बहुत शुभकारी है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 1, 2019, 12:43 PM IST
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