#जीवनसंवाद: जल्दी पाना और ऊबना!

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Jeevan Samvad: सफलता के रास्ते पर चलते हुए हम असफलता को अपना दुश्मन बन बैठे. जबकि असफलता एक रास्ता है, जिससे निकलकर ही आप सफलता की ओर बढ़ते हैं. हमारे मन का कमजोर होना, तनाव के सबसे बड़े कारणों में से एक है.

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कोरोना ने जीवन को संकट के साथ ही एक विकल्प भी दिया है. थोड़ा ठहर कर सोचने का. जब संकट आता है, तब हमारा दिमाग़ गहराई से बचे रहने के बारे में संघर्ष करता है, अपनी गति, दिशा को नए आयाम देता है. दिमाग पर केवल गति (स्पीड) छाई रहती है. तीव्रता नशा है. कामयाबी, तरक्की, संपत्ति सब जल्दी चाहिए. हम संघर्ष में शामिल रस के भाव से दूर हो गए. जल्दी मिलने का नुकसान जल्दी उबने (नीरसता/बोरियत) के रूप में आ रहा है. हमें ऊब से बाहर आने के रास्ते तलाशने हैं!

सफलता के रास्ते पर चलते हुए हम असफलता को अपना दुश्मन बन बैठे. जबकि असफलता एक रास्ता है, जिससे निकलकर ही आप सफलता की ओर बढ़ते हैं. हमारे मन का कमजोर होना, तनाव के सबसे बड़े कारणों में से एक है. हमारा मन बहुत अस्थिर/ कमजोर/ नाजुक हो गया है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि हमने मन को संघर्ष से दूर कर दिया है. महत्वाकांक्षा अच्छी चीज़ है लेकिन अगर वह नियंत्रण से बाहर हो जाए तो हमें ऐसी जीवनशैली की ओर धकेल देती है जिसमें केवल हताशा ही हाथ लगेगी.

जीवन में भौतिक कामयाबी और सफलता के लिए आशावादी रहना अच्छी चीज़ है लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अधिक आशा रखने से निराशा ही हाथ ही लगेगी. निराशा ही मिलेगी. इसका अर्थ यह नहीं कि आशा न रखी जाए बल्कि यह है कि परिणाम के मुकाबले अपने प्रयास और काम पर ध्यान दिया जाए. हम कठिनाई को सरलता के साथ जीने की कला से दूर निकल आए हैं. इसलिए नौकरी, बिजनेस, फिल्म, कला, शिक्षा, पढ़ाई इनमें से किसी भी जगह मुश्किल आते ही हारने लगते हैं. इनसे आंखों में आंखें डाल कर मुकाबला करने की काबिलियत कम होती जा रही है.




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जिसे जल्दी कामयाबी मिल गई उसके लिए जरूरी है कि उसके आसपास ऐसे लोग हैं जो उसे कामयाबी सहने की कला सिखा सकें. कामयाबी को सहना, सुख को बर्दाश्त करना एक सेहतमंद जीवनशैली है. इससे दूर निकलने के कारण ही हम तनाव और डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे हैं. हर छोटी-मोटी समस्या और परेशानी, निराशा को हमें डिप्रेशन/अवसाद कहने से बचना चाहिए. डिप्रेशन एक गंभीर बीमारी है उसका इस तरह सामान्यीकरण ठीक नहीं.


इसे इस तरह समझिए कि किसी अभिनेता या राजनेता की मौत की खबर सुनने के बाद हम लोग उदास हो जाते हैं. हमारा मन खराब हो जाता है. कई बार यह मन की खराबी कुछ घंटे और दिनों के लिए हो सकती है लेकिन धीरेे-धीरे हम ठीक हो जाते हैं. मन ठीक हो जाता है. डॉक्टर इसे डिप्रेशन नहीं कहते, यह डिप्रेशन नहीं है, मन का खराब होना, उदास होना है जो कुछ देर के बाद ठीक हो जाता है. लेकिन, अगर यह उदासी किसी कारण से ठीक न हो पाए. मन पर हर छोटी-छोटी घटना का हानिकारक असर निरंतर बढ़ता रहे तो यह गहरी चिंता (एंजाइटी) में बदल सकता है. इससे डिप्रेशन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

हम जिस जीवनशैली में हैं, उसमें एंजाइटी के डिप्रेशन की ओर बढ़ते जाने की आशंका बढ़ती जा रही है. जो हमें जल्दी मिल जाता है हम उसे संभाल नहीं पाते. जो नहीं मिल पाता उसकी चिंता में डूबे रहते हैं. इस तरह इतनी चिंता में डूब जाते हैं कि जो पास में है उसका सुख भी नहीं ले पाते.


यह सब केवल और केवल इस वजह से हो रहा है क्योंकि हमारा मन अस्थिर/ कमजोर और दुखी हो गया है. इस मन को मजबूत बनाना होगा. हर परिस्थिति में टिककर खेलने वाला बनाना होगा. जरूरी है, मन का डिफेंस (रक्षण) मजबूत हो. जिससे दूसरों द्वारा फेंका जा रहा कचरा हमारे मन पर कम से कम असर डाले. असफलता को ठीक से समझ कर हम मन को कमजोर होने से बचा सकते हैं.

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अपने मन को दुख का कारखाना मत बनाइए. हर किसी को इजाजत मत दीजिए स्वयं को दुखी करने की. ‌‌आप देखेंगे धीरे-धीरे आपका जीवन बदल रहा है. यह बदलाव स्वयं आपके भीतर से शुरू होगा. जो भी उजाला आना है, भीतर से ही आना है! जैसा भीतर वैसा बाहर! शुभकामना सहित...

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