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#जीवनसंवाद: अहंकार और अवसाद!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 16, 2019, 12:21 PM IST
#जीवनसंवाद: अहंकार और अवसाद!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad (जीवन संवाद): जैसे-जैसे संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं, मकान से फ्लैट की तरफ तेजी से बढ़ने लगे हैं. हमारे भीतर स्वतंत्र होने की चाहत तेजी से बढ़ी है. इसका असर यह हुआ कि हर कोई अपने निर्णय, अकेले और अपने अहंकार (Ego) के साथ ले रहा है.

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  • Last Updated: September 16, 2019, 12:21 PM IST
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हर व्यक्ति का स्वतंत्र स्वाभिमान होता है. अपनी सोच, समझ, नजरिए से इसका निर्माण होता है. अगर इस स्वाभिमान में उदारता, प्रेम और स्नेह की सही मात्रा नहीं, तो धीरे-धीरे अनजाने अहंकार (ईगो) में बदल जाता है. यह बात पहली नजर थोड़ी विचित्र लग सकती है, लेकिन अनजाने में ही हमने 'अपने' अहंकार (Ego) को बड़ा कर लिया है. इसे समझने का प्रयास करते हैं.

तकनीक के जीवन में बढ़ते हस्तक्षेप के बीच रिश्ते नाजुक हो चले हैं. 'हवा' का तेज झोंका भी बर्दाश्त करना मुश्किल है. इसकी बड़ी वजह, एक दूसरे के लिए प्रेम, आत्मीयता, स्नेह, समझ की कमी है. घर-परिवार में साथ बीतने वाला समय कम होने के कारण एक-दूसरे को समझने का अवसर न्यूनतम होता जा रहा है. पहले संकट परिवार का होता था. उसका सामना करने की जिम्मेदारी प्राथमिक रूप से बड़ों की होती थी.



जैसे-जैसे संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं, मकान से फ्लैट की तरफ तेजी से बढ़ने लगे हैं. हमारे भीतर स्वतंत्र होने की चाहत तेजी से बढ़ी है. इसका असर यह हुआ कि हर कोई अपने निर्णय, अकेले और अपने अहंकार (Ego) के साथ ले रहा है.


इसे ऐसे समझिए कि पहले हमारी पूंजी संयुक्त थी और खर्चे सीमित. घर में बड़ों से लेकर बच्चे तक सब अपने अपने हिस्से का कुछ ना कुछ त्याग करके घर चलाने में सहयोग करते थे. हमारे पास सब की स्थिति के अनुसार बचत थी. क्रेडिट कार्ड कम थे, बैंकों के पर्सनल लोन बहुत कम थे. जो थे भी, वह बुनियादी जरूरतों के लिए. अब तो स्थिति यह हो गई है कि आपको घूमने फिरने के लिए भी दिल खोलकर बैंक कर्ज देने लगे हैं.

अगर कोई हमसे कहता है कि अपने खर्चे कम करिए, बचत पर ध्यान दीजिए तो अकेले रहने के कारण हमें उसकी बातें सुझाव कम 'ज्ञान' अधिक लगती हैं. ऐसे युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जो सीमित आय में अपना घर चलाने की जगह पर्सनल लोन, केडिट कार्ड की ओर केवल इसलिए बढ़ जाते हैं, क्योंकि अपने परिवार जिनमें पत्नी और बच्चे, कई बार केवल पत्नी होती है, उन्हें ऐसी चीजों के लिए मना नहीं कर सकते, जिनकी जरूरत नहीं है. क्योंकि इससे उनके 'ईगो' को चोट पहुंचती है. बुनियादी जरूरत और विलासिता में अंतर को हम भूल बैठे हैं. परिवार चलाने वाले को लगता है, परिवार के जो भी खर्च हैं उनकी जिम्मेदारी 'चाहे जैसे हो' उन्हें ही पूरी करनी है.

हम अपने ही लोगों को मना नहीं कर पाने के कारण एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करते जा रहे हैं जहां हर चीज ईएमआई पर खरीदी जा रही है. हम बचत से दूर और हर जरूरत के पूरा करने को अपना नया नियम बना चुके हैं. एक ऐसे समाज में जहां सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं. प्राइवेट सेक्टर भी बहुत अधिक अनिश्चित है, ऐसी जीवनशैली हमें भयानक संकट की ओर धकेल रही है. बड़ी संख्या में लोगों के पास साल, छह महीने तो दूर एक महीने तक का इमरजेंसी फंड नहीं है.
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अब लौटते हैं अहंकार की ओर. संयुक्त परिवार से कटने के बाद हर व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं ले रहा है. इस निर्णय प्रक्रिया में मुश्किल से दो लोग शामिल होते हैं. इसमें से भी अधिकांश आय का साधन एक के पास ही होता है. ऐसे में जैसे ही कोई इच्छा प्रकट होती है, तुरंत खयाल आता है चलो यह ईएमआई पर ले लेते हैं. हमारे दिमाग में कर्ज नहीं आता है, ईएमआई आती है. कर्ज में चुकाने का भाव होता है, जबकि ईएमआई संभालने का भाव होता है.

हमारी जरूरत, दूसरों को देखकर तय होने लगी हैं, मुझे यह चाहिए, क्योंकि 'तुम्हारे' पास है. यह भाव इच्छा से अधिक अहंकार बनता जा रहा है. इस पर नियंत्रण हमारी जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए. हम परिवार में मूल्यों की जगह जरूरतों को देते जा रहे हैं. जरूरत अपनी जगह है, वह पूरी भी होनी चाहिए लेकिन किन शर्तों पर और किस कीमत पर उसे कभी नहीं भूलना है.


अगर आप परिवार की कोई जरूरत पूरी नहीं कर पा रहे हैं तो इसे कभी अपने अहंकार से मत जोड़िए. अपनी ओर से कोशिश कीजिए लेकिन, चुनौती के रूप में नहीं सहज संभव प्रयास के रूप में. इसे केवल निष्काम कर्म के भाव से करिए. यह दृष्टिकोण आपको, परिवार को वित्तीय संकट के साथ ही गहरी चिंता की ओर बढ़ने से बचाने में सफल होगा.
पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 16, 2019, 8:59 AM IST
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