#जीवनसंवाद: अभिमान और घर!

#जीवनसंवाद: अभिमान और घर!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: पुरुष थोड़े ही घरेलू काम को करने के बाद अभिमान से भर उठते हैं. वहीं महिलाएं अपनी नौकरी के साथ सभी तरह की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रही हैं. क्योंकि बचपन से उन्हें सिखाया गया है. उससे कहीं अधिक यह स्त्रियों के स्वाभाविक प्रेम की वजह से है.

  • Share this:
कोरोना के पहले लॉकडाउन और उसके बाद अघोषित लॉकडाउन के कारण हमारा सामाजिक जीवन नई तरह से बुना जा रहा है. घर पर संबंधों की नई परिभाषा और व्याकरण गढ़े जा रहे हैं. बहुत से लोगों की जिंदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बदल गई. घर पर कामकाजी रिश्ते नई तरह से बन रहे हैं. कुछ अर्थों में पुरुष प्रधान समाज के लिए परिवर्तन का दौर भी है. घर के कामकाज में मजबूरी में ही सही उनकी हिस्सेदारी बढ़ना सुखद संकेत है.

जिन घरों में दोनों लोग कामकाजी हैं, वहां पर स्वाभाविक रूप से संकट अधिक दिख रहा है. भारत में पुरुषों को घरेलू कामकाज की किसी तरह की कोई न तो आदत है न ही प्रशिक्षण. यही सबसे बड़ा कारण जिस पर दंपति अक्सर उलझते देखे जाते हैं. हमें इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि इसकी जड़ हमारे चेतन मन से अधिक अवचेतन मन में बैठी हुई है. संकट भीतर बैठा है,गहरे में!

#जीवन संवाद : अपना रंग सहेजना!



'जीवन संवाद' को बड़ी संख्या में ईमेल और संदेश मिले हैं. जिनमें तनाव का कारण घर के बढ़े हुए कामकाज के प्रति पुरुषों में उदासीनता है. किसी-किसी घर में तो स्थिति यह है कि लगभग पांच से सात लोग हैं और काम करने वाली महिला कोई एक.उसके बाद सामान्यतः पुरुष इस बात के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं कि उन्हें क्यों कामकाज में मदद करनी चाहिए. इसके पीछे सबसे बड़ी दीवार सोच है. बचपन की आदत है जिसमें कभी लड़कों को घर के कामकाज के बारे में सजग ही नहीं किया जाता. बदलते वक्त के साथ कुछ परिवारों में यह परिवर्तन देखा जरूर जा रहा है लेकिन अभी भी इसका बड़ी संख्या में लोकप्रिय होना बाकी है.
किसी एक दिन घर का कामकाज कर देने वाले पुरुष अक्सर अपने सोशल मीडिया के स्टेटस पर तरह-तरह की तस्वीरें साझा करते रहते हैं. इस बारे में उनकी टिप्पणियां सतही होती हैं. जबकि इसके उलट हर दिन सारा काम करने वाली स्त्रियों के स्टेटस पर ऐसी कोई तस्वीर नहीं होती. तस्वीरों का अंतर पूरी कहानी कहता है!


पुरुष थोड़े ही घरेलू काम को करने के बाद अभिमान से भर उठते हैं. वहीं महिला अपनी नौकरी के साथ सभी तरह की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रही है. क्योंकि बचपन से उसे सिखाया गया है. उससे कहीं अधिक यह स्त्रियों के स्वाभाविक प्रेम का कारण है. स्त्री में प्रेम सहज है, उसे सिखाना नहीं होता. नैसर्गिक, सहज है. करुणा उनके अस्तित्व का सहज भाग है. दूसरी तरफ पुरुष को इसे समझने में बहुत सारा समय लग सकता है. उसके बाद भी यह संभव नहीं कि वह प्रेम को उपलब्ध ही हो सके, क्योंकि हमारा सामाजिक वातावरण से बहुत अधिक सहयोग नहीं करता.


पुरुष और स्त्री का अंतर शारीरिक से अधिक बहुत गहरे में मन में बैठा हुआ है. सामाजिक रूप से भारत अभी भी कृषि व्यवस्था से बहुत दूर गया समाज नहीं है. इसलिए उसके सामंती संस्कारों में परिवर्तन इतनी जल्दी नहीं आएगा. छोटे से छोटे किसान की अपने यहां सारे निर्णय स्वयं करते हैं. उनके निर्णय में स्त्री की आजादी घर की अंदरूनी व्यवस्था तक ही सीमित है. वहां कार्य विभाजन एकदम स्पष्ट है. उसमें घर के बर्तन मांजना, घर के कामकाज निपटाना पुरुष की प्रतिष्ठा और स्वभाव के विपरीत है. ‌

अभी हम सामंती समाज से बहुत दूर नहीं निकले हैं इसलिए जब-जब पुरुषों को घर के कामकाज की ओर जाना पड़ता है उनका अभिमान आधे भरे मटके की तरह छलकने लगता है. हमारे यहां बड़े बूढ़ों ने इसे ही कहा है, अधजल गगरी छलकत जाए.


कितनी महिलाओं के स्टेटस आपने देखे लॉकडाउन में जो घरेलू कामकाज से जुड़ी तस्वीरें दिखाते हों? क्योंकि वह तो निरंतर कर रही हैं. हम ऐसे कितने ही लोगों को जानते हैं जो किसी के यहां दावत में सब कुछ खा लेने के बाद भी दो शब्द तारीफ के नहीं कह पाते. असल में उनमें प्रेम की कमी होती है. उनके भीतर उस भोजन के बनाने में जो गहरा प्रेम छुपा है, उसके बोध की कमी है. क्योंकि उनको हमेशा से वह सहज ही उपलब्ध रहा.

#जीवनसंवाद: प्रेम और अकेलापन!

कोरोना के कारण घर परिवार में बड़े तनाव का कारण पुरुष का यह अभिमान ही है. जब दोनों लोग कामकाजी हैं तो एक व्यक्ति घर से ही ऑफिस का काम करने के कारण कैसे अधिक थक सकता है. जहां दोनों कामकाजी नहीं हैं, वहां भी इस बात को समझना जरूरी है कि सारी जिम्मेदारी स्त्री की कैसे हो सकती है! यह केवल समझने की बात है. स्वीकार करने की बात है. क्योंकि काम बहुत थोड़ा और सहज शारीरिक है.

समस्या शरीर के साथ नहीं कुछ दिमाग़ के साथ है जो अभी भी अपने सामान की संस्कार छोड़ने को तैयार नहीं है. अभी भी हम कितनी ही बेटों की माताओं को यह कहते सुन रहे हैं कि उनके बेटे ने तो कभी काम ही नहीं किया.


अगर आपने अपने अपने बेटे को युवा होने तक भी घर का सहज कामकाज नहीं सिखाया तो यह आपकी समस्या/कमी है. इसमें बहू का कोई दोष नहीं. अभी भी बहुत देर नहीं हुई उसे यह सिखा दीजिए. जिन घरों में बच्चे अभी छोटे हैं वहां इसी क्षण से इसकी शुरुआत होनी चाहिए. मेरे ख्याल में अगर कोरोना संक्रमण के कारण घर का कामकाज पुरुष और लड़के सीख पाए तो हमें इसके लिए इस अनचाहे संकट का आभारी रहना होगा.

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading