#जीवन संवाद: दुख से प्रेम और सुख!

सुख के पास समय नहीं, उसे थोड़ा-थोड़ा सबके पास से गुजरना है. जो चीज़ सबके लिए होती है, वह किसी एक को कैसे मिलेगी! इसलिए, सुख ठहरता नहीं. वह सतत यात्रा में है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 16, 2019, 1:35 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 16, 2019, 1:35 PM IST
सुख से अस्थायी संसार में कोई दूसरी वस्तु नहीं. यह इतना क्षणिक और अल्पायु होता है कि पलक झपकते ही बीत जाता है. महसूस करने के लिए मन ठहरा नहीं कि सुख गुजर जाता है. आरजू, मन्नत, हसरत की कठिन यात्रा से जैसे ही हम सब तक पहुंचते हैं, उसी क्षण लगता है, वह कहीं और निकल गया. कौन सा सुख ऐसा है, जो हमारे पास बैठकर थोड़ी सी गुफ्तगू कर सके. सुख के पास समय नहीं है, उसे थोड़ा-थोड़ा सबके पास से गुजरना है. जो चीज़ सबके लिए होती है, वह किसी एक को कैसे मिल सकती है! इसलिए, सुख ठहरता नहीं. वह सतत यात्रा में है.

#जीवनसंवाद: दूसरों को नहीं जीतना...

सुख परछाई की तरह है, धूप ढलते ही लौट जाता है. दूसरी ओर दुख शाम के रंगों की तरह हमारे भीतर घुलता जाता है. इसीलिए दुख लंबे, गहरे होते हैं, सुख छोटे और हल्के होते हैं. किसी के साथ सुख, प्रेम का सुख‌ कितना छोटा होता है. जबकि अलगाव और विरह इतने घने, गहरे होते हैं कि आत्मा पर उनके निशान मिटाते-मिटाते मनुष्य का जीवन उसेे छोटा लगने लगता है.

तो इसका किया क्या जाए. कैसे इससे पार पाया जाए. जब आपको बच्चे की नाजुक गर्दन में जमी मैल को हटाना होता है तो आप क्या करते हैं. हम बच्चे की गर्दन को एक ओर सहारा देते हैं, दूसरी ओर थोड़ी सख्ती से मैल साफ करते जाते हैं.

जीवन में दुखोंं से निकलने का भी रास्ता कुछ ऐसा है. हम दुख से तभी नहीं निकल पाते, जब उससे नजरें चुराते रहते हैं. बचते रहते हैं. जिस भी चीज से हमें प्रेम हो जाता है, हम उससे मुक्त नहीं होना चाहते. भले ही वह हमारे जीवन के लिए कितनी ही कष्टकारी क्यों न हो. मैंने उससे कहा, तुम सिगरेट छोड़ क्यों नहीं देतीं. टहलना तक मुश्किल है, सांसें फूल आती हैं. सेहत जवाब दे रही है. उसने कहा था, 'यह सब तो मैं भी जानती हूं, लेकिन हमें अपने दुख से ही प्रेम होता है. सिगरेट ऐसा ही दुख है. हम सब असल में अपने बनाए, थोपे हुए दुखों के कर्जदार हैं.


यह सब इसलिए हुआ क्योंकि हम दुखों से बचना चाहते है. उनका सामना नहीं करना चाहते. हम जिनका सामना नहीं करना चाहते, अक्सर उनसे नजरें झुकाते, बचाते हैं. धीरे-धीरे हम उस चीज के साथ हो लेते हैं, जिससे बचना चाहते हैं. कभी किसी ऐसे युवा से बात कीजिए, जिसे प्रेम के बदले उसके अनुसार प्रेम ना मिला हो. आप उससे लाख पूछेंगे कि क्या हुआ दुखी हो? वह कहेगा नहीं. आप उससे कहेंगे तुम इस रिश्ते से बाहर निकल आए? वह कहेगा हां. उत्तर देते समय उसकी आंखों में जो लिखा होता है, उसे आप आसानी से पढ़ सकते हैं. भारतीयों में दुखों को पाले रखने की अनूठी क्षमता होती. हम किसी ना किसी दुख की तलाश में होते हैं जिसे ओढ़ा जा सके. इससे हमें सहानुभूति मिलती है. लोग हमारा खयाल रखते हैं, देखो कितना दुखी है, वह!

इस मनोविज्ञान केे कारण ही हम सुख से वंचित हैं. हम भीतर से कभी स्वीकार ही नहीं कर पाते कि हम सुखी और स्वतंत्र हैं. क्योंकि ऐसा करतेे ही हम वह सहानुभूति खो बैठते हैं जो दुखी के साथ होती है. इसलिए हम अनजाने में दुख ओढ़े रहते हैं. खुद के प्रति थोड़ी सी सजगता, कठोरता से हम स्वयं को अनेक दुखों से बचा, निकाल सकते हैं.
Loading...

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)


ये भी पढ़ें :

#जीवन संवाद: दूसरों को नहीं जीतना...

#जीवन संवाद एहसानों का बोझ!
First published: August 13, 2019, 8:15 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...