#जीवन संवाद: भीतर से ठोस!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 10, 2019, 11:19 AM IST
#जीवन संवाद: भीतर से ठोस!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हम भीतर से ठोस, गहरे नहीं हैं. हमारी दृष्टि इतनी अधिक बाहरी है कि भीतर की बातें उसमें आसानी से समाती नहीं. हम किसी को समझने की जगह उसके बाह्य आकर्षण पर अधिक मोहित हैं.

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हम बाहरी आकर्षण पर इतने अधिक मोहित हैं कि भीतर की ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है. हम कहते तो यही रहते हैं कि असली सुंदरता तो मन की होती है. लेकिन हमारा व्यवहार आचरण और अंतर्मन में इसकी पुष्टि नहीं करते. हमारा समाज रंग के भेद से बहुत गहरे से जुड़ा हुआ है. गोरे रंग को अब आकर्षक माना जाता है. सांवले, काली रंग की त्वचा को पसंद करने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अभी भी वह सम्मानजनक स्थिति से पीछे है. हमारी पहचान एक ऐसे समाज के रूप में जहां हम अपनी पहली पसंद रंग के आधार पर तय करते हैं. ‌

हमारी मनोदशा को सबसे अधिक क्रीम बनाने वाली कंपनियों ने परखा और समझा. कैसे अचानक त्वचा का रंग बदलने की अंतस चेतना से एक बाजार खड़ा हो गया. यह इसीलिए हुआ, क्योंकि हम भीतर से ठोस नहीं हैं. हमारे सोच विचार और रीति नीति में रंगभेद बहुत गहरा है.

भारत में अगर लड़की का रंग गहरा, सांवला है तो इस बात की कीमत अधिक दहेज के रूप में चुकाई जाती है. मजेदार बात यह है कि सब लोग इस बात के लिए तैयार हैं. वर पक्ष को लगता है यह उसका अधिकार है. दूसरा पक्ष अपनी हीनता के बोध से दबा हुआ है.


जिन चीजों में हम यकीन नहीं करते, वह केवल हमारे चाहने भर से नहीं मिल जातीं. रंगभेद का हमारे यहां सबसे बड़ा कारण यही है. मेरी एक और बात से आप संभव है कि थोड़े सहमत हों, लेकिन यह सत्य है कि हम अनेक ऐसे परिवारों में परिचित हैं, जहां किसी विशेष बच्चे के दुलार का बड़ा कारण उसका रंग है. इसका उल्टा भी होता है, रंग विशेष के कारण किसी बच्चे को विशेषकर वह लड़की है तो जीवन भर के लिए ताने सहने पड़ते हैं.

यह सब इसलिए है, क्योंकि हम भीतर से ठोस, गहरे नहीं हैं. हमारी दृष्टि इतनी अधिक बाहरी है कि भीतर की बातें उसमें आसानी से समाती नहीं. हम किसी को समझने की जगह उसके बाह्य आकर्षण पर अधिक मोहित हैं.


इस बात को बहुत आसानी से आप अपने मित्रों के प्रेम संबंधों, शादी-ब्याह की चर्चा सिनेमा में नायक-नायिका के रंगों के चुनाव से भी समझ सकते हैं. सिनेमा हमारे व्यवहार को देखकर छवियां गढ़ता है, उसके बाद हम उसकी छवियों में कैद होकर जीवन को गढ़ने लगते हैं.

हमने शायद ही कभी इस पर विचार किया हो कि रंग के आधार पर कही जाने वाली टिप्पणी, सुनने वाले के मन पर कैसा प्रभाव छोड़ती है. इसलिए, जीवन के प्रति दृष्टिकोण को कहीं अधिक उदार बनाने और दूसरों के प्रति सजग रहने की जरूरत है. यह तभी संभव है जब हम भीतर से स्वयं को ठोस, अंतर्मन को बाह्य आकर्षण से मुक्त और अपनी चेतना को मनुष्यता से जोड़ पाएं.
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पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 10, 2019, 11:17 AM IST
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