#जीवनसंवाद: जिम्मेदारी का ट्रांसफर नहीं करना भी प्रेम!

#जीवनसंवाद: जिम्मेदारी का ट्रांसफर नहीं करना भी प्रेम!
जीवन संवाद.

Jeevan Samvad: सच तो यह है कि खामोशी से किए गए काम ही रंग लाते हैं. हम सब अपने जीवन में प्रेम के प्रति जितने अधिक उदात्त और गहरे उतरते जाएंगे, वैसे-वैसे खामोशी को प्राप्त होते जाएंगे. शोर में कुछ भी नहीं पनपता. प्रेम भी नहीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 21, 2020, 10:37 AM IST
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प्रेम की कोई एक परिभाषा नहीं. किसी एक तरह से उसे ठीक-ठीक व्यक्त करना भी संभव नहीं. प्रेम विपुल संभावना है. उसके रंग इतने गहरे, बहुरंगी हैं कि सरलता से उन्हें पकड़ पाना भी संभव नहीं. इसके बाद भी प्रेम के सरल उपयोग के लिए हम इतना तो कही सकते हैं कि प्रेम हमारे चित्त को उदार, सहनशील, स्नेही बनाने के साथ जिम्मेदार भी बनाता है.

जीवन संवाद' के एक सत्र में किसी ने पूछा, प्रेम की सरलतम परिभाषा क्या हो सकती है. इसका कोई एक उत्तर दे पाना आसान नहीं. मैंने इतना ही कहा, 'अपनी जिम्मेदारी का ट्रांसफर नहीं करना भी प्रेम है!

'जीवन संवाद' के एक सुधि पाठक और मित्र का आज मैं विशेष उल्लेख करना चाहता हूं. आप उन चुनिंदा लोगों में से एक हैं जो अपनी जिम्मेदारी किसी को ट्रांसफर नहीं करते. बात कितनी ही मुश्किल क्यों ना हो! आपका नाम है, श्री रवीन्द्र प्रसाद मिश्र. जीवन में ऐसे अनेक पल आते हैं, जब हम देखते हैं कि हर कीमत पर साथ निभाने का दावा करने वाले भी सुरक्षित रास्ता तलाशने लगते हैं. लेकिन रवीन्द्र जी अपने रास्ते से पीछे हटते नहीं दिखे. उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि जो काम वह कर सकते हैं, उससे एक इंच पीछे नहीं हटते. प्रसन्नता उनके स्वभाव का स्थाई भाव है.



सच तो यह है कि कोई भी बड़ा काम बिना प्रसन्न मन के संभव नहीं. जब तक चित्त में आनंद नहीं है, मन का उदार और स्नेहिल होना संभव नहीं.

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मिसाल के तौर पर कोरोना के संकट समय में जब लोग अस्पताल का नाम सुनकर डरने लगते हैं. पहले, वह बेटे को साथ लेकर निकल पड़े. उसके बाद और जरूरत पड़ी तो आगे बढ़कर सारे खतरे उठाते हुए सहर्ष सारथी बनने को तैयार हो गए.

रवीन्द्र जी अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे से साझा करने को नहीं कहते. अपने किए का जिक्र करना तो दूर, मदद में इतनी खामोशी बरतते हैं कि अक्सर परिजन/प्रियजन तक को जानकारी नहीं मिलती.


बहुत कम लोगों के पास इतना प्रेम होता है कि वह खामोशी से अपनी जिम्मेदारी निभा पाएं! खामोशी से जिम्मेदारी निभाना प्रेम का समंदर हो जाना है. प्रेम समंदर होकर ही पूर्णता को प्राप्त होता है. अपेक्षा से रिक्त होकर. बहुत कम लोग जीवन में इस स्थिति को उपलब्ध हो पाते हैं, लेकिन जो हो सकें, उनका जीवन ही उस सुख तक पहुंच पाता है, बाकी दुनिया जिसकी कामना करती है!

सोशल मीडिया के हंगामे के जमाने में जब लोग किसी भूखे को रोटी का पैकेट देते हुए भी फोटो खिंचवाना नहीं भूलते. मदद करने से पहले देख लेते हैं कि कैमरा कहीं बंद तो नहीं हो गया. हमें सचमुच रवीन्द्र जी जैसे मनुष्य, मन, स्नेह की जरूरत है. सच तो यह है कि खामोशी से किए गए काम ही रंग लाते हैं. हम सब अपने जीवन में प्रेम के प्रति जितने अधिक उदात्त और गहरे उतरते जाएंगे, वैसे-वैसे खामोशी को प्राप्त होते जाएंगे. शोर में कुछ भी नहीं पनपता. प्रेम भी नहीं.

कोरोना इस समय हमारा सबसे बड़ा संकट जरूर है. लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह हमेशा के लिए नहीं है. हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता. हां, बस एक चीज़ होती है, उसका ही नाम प्रेम है. हम सबको एक दूसरे के लिए इसे ही बचाए रखना है. क्योंकि मनुष्यता इसके बिना एक कदम भी नहीं चल पाएगी. शुभकामना सहित...
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