#जीवन संवाद: टूटे हुए रिश्तों का प्रेम!

यह 'डियर ज़िंदगी' का 451 वां अंक है. आपके स्नेह और 'जीवन संवाद' के प्रति आत्मीयता के कारण यह संभव हुआ.आभार!

News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 3:53 PM IST
#जीवन संवाद: टूटे हुए रिश्तों का प्रेम!
यह 'डियर ज़िंदगी' का 451 वां अंक है. आपके स्नेह और 'जीवन संवाद' के प्रति आत्मीयता के कारण यह संभव हुआ.आभार!
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Updated: August 7, 2019, 3:53 PM IST
'डियर ज़िंदगी' को ईमेल, मैसेंजर, व्हाट्सअप पर मिलने वाले सवालों के केंद्रीय विषय रिश्ते और प्रेम ही होते हैं. हमने संबंधों को 'शरीर और रिश्तों की डोर' में कुछ उलझा दिया है. आइए आज इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करते हैं. कुछ छोटी-छोटी कहानियों के साथ.

मेरे एक मित्र हैं जो पेशे से इंजीनियर हैं. कोई 15 बरस पहले उनको कॉलेज में प्रेम हुआ. प्रेम लगभग 10 बरस चला. उसके बाद दोनों अपने अपने रास्ते पर निकल गए. रिश्ता कुछ ऐसा था कि सबको पता होते हुए भी किसी को नहीं पता था. कभी किसी के सामने कहा नहीं, लेकिन सबको पता तो था. जब यह रिश्ता नहीं रहा, तो हमारे मित्र और उनके कुछ मित्रों ने इस तरह की बातें कहीं कि अब उस युवती से रिश्ते रखने का क्या अर्थ. उसने तो हमारे मित्र को धोखा दिया है. यह एक अजीब सी स्थिति थी, क्योंकि वह हमारे मित्र की प्रेमिका होते हुए हम सबकी मित्र भी थी. इस नाते उससे हमारा मित्रता का स्पष्ट रिश्ता था. कुछ लोगों ने उनसे संवाद समाप्त कर लिया तो कुछ लोगों ने स्थगित कर लिया.

मैंने ‌इसे कुछ इस तरह लिया, 'इस बारे में जब तक दोनों लोगों का पक्ष मेरे सामने स्पष्ट नहीं होता, मैं किसी एक को सुनने की स्थिति में नहीं हूं. क्योंकि मैं दोनों से ही दूर किसी दूसरे शहर में था. केवल मित्र का पक्ष था अपनी दोस्त का नहीं.' आज जब यह कहानी लिखी जा रही है, दोनों अपने-अपने जीवन में परिवार के साथ सुखद स्थितियों में हैं.


लेकिन इस कहानी के डेढ़ दशक बाद भी प्रेम, रिश्तों को लेकर हमारे सोच-विचार में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है. आज भी हम संबंधों को लेकर बहुत अधिक अधिकारवादी हैं. हम छोटी और संकुचित सोच के साथ जिंदगी गुजार देते हैं. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि हम रिश्तों को शायद ही शरीर से आगे देख पा रहे हैं. खासकर प्रेम के बारे में हमारा नजरिया बहुत संकुचित है. एक रिश्ते में कितने आयाम होते हैं, यह कह पाना संभव नहीं! इसे कुछ ऐसे समझें कि एक ही पेड़ पर पकने वाले आम के अलग अलग फल स्वाद में भिन्न हो सकते हैं. एक ही वातावरण में बड़े होने वाले भाई-बहन एकदम भिन्न होते हैं. क्या है जो हमें समान चीजों के बीच रहते हुए एक-दूसरे से अलग बनाता है! इसे ही तो मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता कहते हैं. यह जो अलग होना है, यही वह चीज है जो प्रकृति ने विरासत में दी है. एक रिश्ता बहुत सारी चीजों से मिलकर बनता है. जैसे कपड़े का खूब उपयोग करने पर उसमें सिलवटें पड़ जाती हैं, कुछ कमजोर दिखने लगता है, लेकिन उसमें 'दरारें' नहीं दिखती, हालांकि वह होने को होती हैं. कुछ ऐसा ही हमारा मन है, बाहर तो वह बहुत थोड़ा ही दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर उसमें लहरों का समंदर उमड़ता रहता है. ऐसे मन में किसी के प्रति अगाध प्रेम होते हुए भी दूसरे के लिए निरादर न हो यह बिल्कुल संभव है! एक साथ दो परस्पर विरोधी लोगों के लिए एक जैसे विचार भी संभव हैं.

अब समस्या यह आ रही है कि प्रेम के लिए रास्ते तो हजार खुल गए. विकल्प भी खूब हो गए. दरवाजे न सही खिड़कियां तो खुल ही गईं. लेकिन हमारे सोचने-समझने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में 'प्रेम और रिश्ते' अभी भी वैसे ही हैं जैसे ठेठ सामंती समाज में होते हैं. घोर अनुमतिपरक और कुंठा से भरे हुए. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक कहानी अमेरिका के मिनेसोटा राज्य की. यह अमेरिका का 12वां सबसे बड़ा और 21वां सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है.

मिनेसोटा का जीवन स्तर संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे ज्यादा है. वह देश में सबसे अधिक शिक्षित और धनी राज्यों में से एक है. यहां रिश्तों को ताजी हवा मिली है. यहां 20 साल पहले अलग हुए दंपति के बीच प्रेम के नए गीत खिले हैं! मैरी जेगलेर और बिल हेनरिच! बीस साल पहले अलग हो गए थे, अपने दो बच्चों की खातिर. उन्होंने कभी भी अपने बीच की दोस्ती को खत्म नहीं किया. यह दोस्ती खत्म नहीं होने की बात भारतीय संदर्भों में बहुत ही अनूठी है, क्योंकि हमारे यहां दंपतियों के संबंध या तो बहुत खराब होने के बाद भी कायम रहते हैं या फिर ऐसे टूटते हैं कि रिश्तों के पुल कभी जुड़ ही नहीं पाते! कुछ समय पहले बिल को डायबिटीज की वजह से किडनी में समस्या हुई. दोनों किडनी खराब हो गईं. किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी गई. उनके तमाम दोस्तों, रिश्तेदारों के टेस्ट किए गए, लेकिन किसी की भी किडनी 'मैच' नहीं हुई. अंत में केवल उनकी बेटी की किडनी मैच हुई, लेकिन उनका किडनी देना ठीक नहीं माना जा रहा था, क्योंकि उनके खुद के बच्चे बहुत छोटे थे. मैरी नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी किडनी दे. इस बीच उन्होंने खुद अपनी जांच कराई, हालांकि उनकी किडनी मैच होने की संभावना बहुत कम थी, क्योंकि उनका ब्लड ग्रुप 'रेयर' था, लेकिन न जाने कैसे मैरी की किडनी उनके पति की किडनी से मैच कर गई. कुछ दिन पहले बिल और मैरी का सफल ऑपरेशन कर किडनी प्रत्यारोपित भी कर दी गई.

अमेरिका खासकर मिनेसोटा में इस अनूठे प्रेम की भरपूर चर्चा हो रही है. मैरी ने बिल की मदद करके, उन्हें नया जीवन देकर एक अनूठी मिसाल कायम की है. मैरी ने कहा कि उनके इस कदम के बाद लोग अपने पूर्व पति या पत्नी के प्रति अपनी धारणा बदलें, तो शायद इसका कोई महत्व साबित हो सके. यह मेरे लिए कोई बड़ा फैसला नहीं था, बस कुछ ऐसा था मानों किसी ने फोन किया और कहा कि इस काम में मेरी मदद करें!
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मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि जितना संभव हो, इस अंक को दूसरों तक पहुंचाएं ताकि हम रिश्तों, प्रेम और स्नेह को उन सब तक पहुंचा सकें, जिन्होंने अपने दरवाजे, खिड़कियां छोटी-छोटी बातों और मनमुटाव के चलते बंद कर दी हैं. रिश्तो में दूसरी गली में मुड़ जाने का अर्थ यह नहीं है कि कभी भी आप पहली गली में थे ही नहीं. प्रेम मन और दिमाग से आसानी से नहीं मिटने वाली चीज है. अगर वह जरा जरा सी बात पर यूं ही मिट, चटक, छिटक गया गया तो यकीन मानिए, वह प्रेम नहीं कुछ और था. साथ होना, साथ रहना प्रेम का एक छोटा सा हिस्सा भर है, केवल वही प्रेम नहीं है!

रिश्तों की गली को हमने असंतुलित और संकरा बना दिया है. मनुष्य पर जीवन से अधिक रिवाज का शासन चल रहा है! जिंदगी बड़ी चीज है, रिश्तों के चक्रव्यूह के बीच यह बात बहुत पीछे छूट गई!


पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)


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First published: August 7, 2019, 3:53 PM IST
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