#जीवनसंवाद: मेरे गांधी!

जीवन संवाद.
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#Jeevan Samvad: गांधी को हम सत्ता प्रतिष्ठानों के भरोसे नहीं छोड़ सकते. आइए, गांधी को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं. गांधी की ओर एक कदम बढ़ाने से हमारे पांच संकट कम होते हैं. जरा सोचिए, हम गांधी की ओर पांच कदम चल गए, तो क्या होगा!

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 2, 2020, 11:50 PM IST
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गांधी का हम सबके जीवन में अलग-अलग योगदान है. बापू के साथ रिश्ते अपनी-अपनी खुशबू से महकते हैं. आप सबकी अपनी-अपनी कहानियां संभव हैं. मेरी कहानी थोड़ी अलग है. एक दस-बारह साल के बच्चे को गांधी कुछ ऐसे मिले जैसे अमावस की रात में जंगल में भटकते मुसाफिर को अचानक कोई दीया मिल जाए! गांधी मेरे बचपन में उजाले की तरह आए. आशा की ताबीज़ की तरह आए. काजल के टीके की तरह आए. आए और आते ही चले गए.

मध्य प्रदेश का एक जिला है, रीवा. बाल विवाह के लिए मध्य प्रदेश का एक यह कोना भी किसी जमाने में राजस्थान की तरह ही चर्चित रहता था. पढ़े-लिखे होने का शिक्षा से कोई संबंध नहीं होता, इस बात को बचपन में ही मैंने बहुत अच्छी तरह समझ लिया था. हमारे लंबे-चौड़े संयुक्त परिवार में इंजीनियर, शिक्षक, बैंककर्मी समेत दूसरे सभी पेशे के लोग थे. देश के अलग-अलग हिस्सों में थे, लेकिन बच्चों के विवाह को लेकर उनके मन में कोई दुविधा नहीं थी.

हम कितनी हल्की-फुल्की चीजों को संस्कार और संस्कृति मान लेते हैं. परंपरा मान लेते हैं, जबकि इनका जीवन से कोई सीधा रिश्ता नहीं है. यह ओढ़ने-बिछाने की चीज नहीं. मनुष्यता से बड़ी चादर कोई दूसरी नहीं. मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे अनमोल है, जो भी चीजें उसमें बाधक बनती हैं, उनमें से किसी को भी परंपरा कहकर उनका बचाव नहीं किया जाना चाहिए.

जब मुझे कक्षा पांच में बताया गया कि मेरा विवाह होना तय हुआ है, तो सबसे पहले मैंने अपने पिताजी से यही पूछा, '...लेकिन गांधी तो बाल विवाह के विरुद्ध खड़े हैं. गांधी का पाठ मैंने उन्हें सुना दिया. मेरे मन में गांधी के लिए बहुत श्रद्धा है. आप कहते हैं, गांधी की तरह सच बोलिए, इसलिए गांधी की बातें हमें माननी चाहिए.' मेरे पिता बहुत अच्छा सुनते हैं. उन्होंने सुना और कहा, 'इस पर तो दादा ही फैसला करेंगे'. बात खत्म हो गई. दादा के यहां पर प्रेम और दुलार तो बहुत था, लेकिन फैसले पर पुनर्विचार नहीं होता था. उनके कहे शब्दों का एक ही अर्थ था, फैसला हो गया. लेकिन मैं उनका पोता हूं. हमारे गांव में कहते हैं कि दादा की जिद पोते तक जाती है.



मैंने गांधी को पकड़ लिया. बारह साल का बच्चा गांव के बड़े-बुजुर्गों के सामने सभी पैमाने पर ठीक था. बस उसकी एक ही गलती थी कि वह अपनी परंपरा के नाम डुबोने चल पड़ा था. आज जिनको आम बातचीत की भाषा में हम तनाव कहते हैं. उदासी/निराशा कहते हैं. उन सबका सामना बारह से सत्ताइस वर्ष तक मैंने खूब किया. जमकर किया. गांधी के सहारे किया. वह मेरे जीवन के सबसे जरूरी उजाला हैं. आपको यह कहानी 'लगे रहो मुन्नाभाई' सरीखी लग सकती है, लेकिन जब जिंदगी में यह सब गुजर रहा था. तब तक यह फिल्म नहीं आई थी.

गांधी, मुझे केवल यही नहीं सिखाते रहे कि अगर तुम्हारे बोध में सच्चाई है. नैतिकता है, तो उसके लिए डटे रहना. खड़े रहना, भले ही अपने माता-पिता के विरुद्ध ही क्यों न जाना पड़े. परिवार के विरुद्ध क्यों न जाना पड़े. बल्कि इसके साथ ही यह भी समझाते कि हारना नहीं है.


गांधी ने मुझे सबसे सुंदर बात यह सिखाई कि असहमति के साथ प्रेम करना है! असहमति के बीच प्रेम को कम नहीं होने देना है. कस्तूरबा, सुभाषचंद्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर और जवाहरलाल नेहरू भी. सबके साथ उनकी असहमतियां हैं, लेकिन प्रेम भी तो भरपूर है. प्रेम में कहीं कोई कमी नहीं. इनको छोड़िए, अंग्रेजों के प्रति भी गांधी करुणा से भरे हुए हैं. गांधी, महात्मा बुद्ध के बहुत निकट हैं. ईसा मसीह के भी पास हैं. मोहम्मद साहब के साथ हैं.

गांधी की करुणा, पवित्रता, निर्भीकता, अहिंसा और सत्याग्रह का महत्व केवल इससे समझा जा सकता है कि दुनिया आज जिस आर्थिक संकट, हिंसा और मूल्यहीनता के द्वार पर खड़ी है, वह केवल गांधी को छोड़ देने के कारण है. गांधी, हमारे भाषण में उतर आए. दीवारों और चौराहों पर नजर आते हैं, लेकिन वह हमारी चेतना में कहीं नहीं हैं. चीजों का इस्तेमाल करने की हमारी आदत कुछ ऐसी बिगड़ी कि हम गांधी का भी इस्तेमाल करने लगे!

गांधी हमें कभी अकेला नहीं छोड़ते! कम से कम मुझ अकेले, दुनिया से जूझते बच्चे का साथ तो उन्होंने कभी नहीं छोड़ा! उस समय भी नहीं जब मैं ठीक से उनको जानता भी नहीं था. मुझे आपका अनुभव नहीं पता, लेकिन मेरा अनुभव तो यही है.


गांधी को हम सत्ता प्रतिष्ठानों के भरोसे नहीं छोड़ सकते. आइए, गांधी को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं. गांधी की ओर एक कदम बढ़ाने से हमारे पांच संकट कम होते हैं. जरा सोचिए, हम गांधी की ओर पांच कदम चल  गए, तो क्या होगा!

अपनी जीवन आस्था को गांधी का रंग दीजिए. यह बहुत पक्का है. एक बार चढ़ गया, तो आसानी से नहीं छूटेगा. यह मेरे गांधी की कहानी है. आप भी अपने-अपने गांधी को याद कीजिए.

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