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#जीवनसंवाद: मैं हूं, क्योंकि हम हैं!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 30, 2019, 1:19 PM IST
#जीवनसंवाद: मैं हूं, क्योंकि हम हैं!
#जीवन संवाद : मैं हूं, क्योंकि हम हैं!

Jeevan Samvad: हम सब एक-दूसरे के साथ मिल बांटकर, साझा करने के सामाजिक परिवेश के बीच पले-बढ़े होने के बाद भी अपनी सामान्य, सहज सामाजिकता से दूर होते जा रहे हैं. उबुन्तु, अफ्रीका की कथा जरूर है, लेकिन अलग-अलग नाम, रूप में हमारे समाज का हिस्सा रही है.

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  • Last Updated: October 30, 2019, 1:19 PM IST
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अपने होने को जब तक हम, 'हम' से नहीं जोड़ेंगे, 'मैं' अकेला, अधूरा रहेगा. मैं का भाव हमेशा से था, यह कोई नई चीज नहीं है. लेकिन इसमें इतनी प्रबलता नहीं थी, जैसी हम इस समय में देख रहे हैं. रिश्तों के बीच तनाव, अनबन का बड़ा कारण हमारे भीतर 'मैं' का बड़े होते जाना है.

हम भीतर से बहुत अधिक आत्म केंद्रित होते जा रहे हैं. हमारी पूरी दुनिया अपने इर्द-गिर्द ही बुनती जा रही है. अपने अलावा जब दूसरों को देखना ही बंद हो जाए तो समझिए, 'मैं' का असर गहरा हो रहा है.


उबुन्तु, अफ्रीकी मनोवैज्ञानिक लघुकथा है. बच्चों के बीच उनके सुख-दुख साझा करने, अंतर्मन को पढ़ने के लिए छोटा सा प्रयोग किया गया. एक पेड़ के ऊपर खाने की कुछ चीजें रखी गईं. एक दूरी पर ले जाकर बच्चों को खड़ा कर दिया गया, और कहा गया कि खाने की चीजों की ओर दौड़ें, जो पहले पहुंच जाएंगे वह चीज उनको मिल जाएगी. जैसे ही बच्चों को दौड़ने के लिए कहा गया, उन्होंने एक-दूसरे के हाथ पकड़े और दौड़ना शुरू किया. किसी ने आगे निकलने की कोशिश ही नहीं की.

सब साथ दौड़ते हुए पेड़ के पास पहुंचे और सब ने चीजें बराबरी से बांटकर खाईं. जब बच्चों से इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा- उबुन्तु (UBUNTU) . इसका मतलब है, मैं हूं क्योंकि हम हैं. बच्चों ने कितनी बड़ी बात सरलता, सहजता से कह दी.


हम सब एक-दूसरे के साथ मिल बांटकर, साझा करने के सामाजिक परिवेश के बीच पले-बढ़े होने के बाद भी अपनी सामान्य, सहज सामाजिकता से दूर होते जा रहे हैं. उबुन्तु, अफ्रीका की कथा जरूर है, लेकिन अलग-अलग नाम, रूप में हमारे समाज का हिस्सा रही है.
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हमारे व्यवहार, चिंतन में सबके साथ सुखी रहने की समृद्ध परंपरा रही है. शहर बढ़ने के साथ, हमारे यहां अकेलापन तेजी से आकार लेने लगा है. हमें साथ मिलकर रहने की अपनी पुरानी सामाजिकता की ओर लौटने की सबसे अधिक जरूरत है.


हमें अकेले ही सुखी, सबल होने के भाव से निकलना होगा. सबके साथ मिलजुल कर रहने में सबसे बड़ी बाधा 'मैं' का बड़ा होते जाना है. ऐसे शहरों में भी जहां एक साथ रहा जा सकता है, वहां भी परिवार के विघटन का कारण अपने-अपने अहंकार को नहीं संभाल पाना ही है. हमारे सपने जरूरी हैं, मन के ख्वाब भी सहेजने हैं. लेकिन इनके बीच अगर संतुलन नहीं है तो जीवन की कमी हमेशा खलती रहेगी. इसलिए, जितना संभव हो, 'मैं हूं, क्योंकि हम हैं' के भाव को अपने और अपनों के बीच सहेजा जाए.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: October 30, 2019, 12:25 PM IST
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