#जीवनसंवाद: सोच और मन! ‌

#जीवनसंवाद: सोच और मन! ‌
#जीवनसंवाद

Jeevan Samvad: मन और सोच उम्र बढ़ने के साथ-साथ एक-दूसरे के पर्यायवाची बनते जाते हैं. कुछ चीजों के लिए मन नहीं मानता, लेकिन सोच के बंधन उसे इसके लिए तैयार करते हैं. ठीक इसी तरह सोच विचार के किसी काम के लिए आप मना कर देते हैं लेकिन मन नहीं मानता!

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 24, 2020, 11:52 PM IST
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पहले क्या बनता है. मन अथवा सोच! हम जब छोटे होते हैं तो हमारी कोई सोच नहीं होती. हां, मन जरूर होता है. इसीलिए बचपन में बच्चे मनमौजी होते हैं. बहुत ज्यादा सोच विचार उसमें शामिल नहीं होता. जो अच्छा लगता है वही तो चाहिए. जो चाहिए उसी के लिए पूरी शक्ति लगा देते हैं. इस तरह दिखें तो मन पहले आया और सोच बाद में.

लेकिन पहले कौन आया, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ना चाहिए. क्योंकि धीरे-धीरे दोनों एक ही हो जाते हैं. मन और सोच उम्र बढ़ने के साथ-साथ एक-दूसरे के पर्यायवाची बनते जाते हैं. कुछ चीजों के लिए मन नहीं मानता, लेकिन सोच के बंधन उसे इसके लिए तैयार करते हैं. ठीक इसी तरह सोच विचार के किसी काम के लिए आप मना कर देते हैं लेकिन मन नहीं मानता! इसलिए बाद में अंततः मन के रास्ते पर लौट आते हैं.

बच्चे के मन पर अनुभव की बारिश की बूंदें धीरे-धीरे उसकी सोच बनाती हैं! बारिश सबको एक जैसा नहीं भिगोती. हम उतना ही गीले होते हैं, जितना हमारा शरीर उसे स्वीकार करता है. इसीलिए तो एक जैसी बारिश सब पर अलग-अलग असर करती है.








लेकिन, ऐसा नहीं है कि मन एक बार बनने के बाद नहीं बदलता. वह बदलता, बनता-बिगड़ता रहता है. इसीलिए तो अचानक से एक दिन महल छोड़कर कोई सिद्धार्थ, वन जा कर बुद्ध बन जाते हैं. चमकती दुनिया को छोड़़ विनोद खन्ना संन्यासी बनते हैं, उसके बाद फिर संन्यास तोड़़कर चमक -दमक की ओर लौट जाते हैं. ‌
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बाहर से देखने पर आपको यह निर्णय किसी एक दिन के लग सकते हैं लेकिन ऐसा है नहीं. असल में भीतर जो मन तैयार होता रहता है, उस पर निर्णय की मुहर तभी लगती है, जब वह सोच के स्तर पर परिपक्व हो जाता है. इसेे हम दुनिया को अपना फैसला कहकर बताते हैं. ‌आपने जो फैसला किया है, असल में वह आपने नहीं किया. उसे आपके मन ने करवाया है. मन आपको तैयार करता है, सोच बनती है. फैसला बाहर आता है और आपको लगता है, सब आपने किया!

जबकि सब कुछ इतनी बारीकी से कई बार हो रहा होता है कि आपको पता नहीं चलता. जब आपको पता नहीं चलता तो कोई आपके कितने ही नजदीकी हो, उस व्यक्ति को कैसे पता चलेगा! आत्महत्या ऐसी ही सूक्ष्मता से घटने वाली घटना है. किसी को पता नहीं. इसीलिए, 'जीवन संवााद' में हम इस बात पर बल देतेे हैं कि मन के खेल (Game of Mind) को समझें. अपने ही मन के प्रति सावधानी और होश पूर्वक (alertness) रवैए से हम मन का खिलौना बनने से बच सकते हैं.

लोगों के बारे में राय बनाने, फैसला करने से पहले बहुत जरूरी है कि हम अपने बारे में अच्छी तरह जांच पड़ताल कर लें. समझ लें, इस बात को कि हमारे भीतर क्या चल रहा है. इसमें सबसे अहम है हमारी सजग दृष्टि. होश पूर्वक (alertness) निर्णय करने की शक्ति! ‌


हम दूसरों से इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि अपने मन पर उनकी बातें थोपते जाते हैं. मन कह रहा है नहीं ठीक नहीं है, लेकिन हम मानने को तैयार बैठे हैं. इससे मन का दमन होता है. मन खराब महसूस करता है. वह उपेक्षित होता जाता है. उपेक्षित मन क्या करेगा! इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं.

इसीलिए हमें अचानक से गुस्सा आता है. बहुत तेज. पुरानी यादें बार-बार चोट करती रहती हैं दिमाग पर. क्योंकि मन के जाले ठीक से साफ़ नहीं किए गए.‌ मन और मकड़ी में एक ही समानता है- दोनों अपने भीतर से ही जाल तैयार करते हैं. बाहर से उन्हें किसी चीज़ की जरूरत नहीं पड़ती. इसीलिए, ज़रा सी बात का हम घर-परिवार में बखेड़ा खड़ा कर लेते हैं.

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अच्छे-भले पति-पत्नी भी अगर मन को ठीक से न संभाल पाएं तो उनके रिश्ते साथ रहते हुए भी जिंदगी भर टूटे रहते हैं. रिश्ते थोड़ी-बहुत गठान तो बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन बार-बार रफू होने से, मन कमजोर पड़ने लगता है. इसलिए मन के खेल के प्रति भी सतर्क रहना जरूरी है.


मन के दौड़ने और उसकी वास्तविक इच्छा में वही फर्क है, जो गहरे प्रेम और शरीर के आकर्षण में है. अक्सर हम इनको समझने में गड़बड़ी करते हैं. क्योंकि उस समय हम होश पूर्वक निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते. इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने मन को बहुत ध्यान से देखें. उसके प्रति सजग बनें. इससे हमारे फैसले स्थाई होंगे. जीवन सुकून और सुख को उपलब्ध होगा. मन को कोसिए नहीं. सतर्क होकर उसके साथ जीवन के आनंद की ओर बढ़िए. शुभकामना सहित...


संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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