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#जीवनसंवाद: मन किसके बस में है...

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 21, 2019, 9:13 AM IST
#जीवनसंवाद: मन किसके बस में है...
#जीवनसंवाद: मन किसके बस में है...

Jeevan Samvad: रिश्तों में दूरी कुछ कहने, सुनने की जगह मन में 'बनाई गई 'धारणा के आधार पर बढ़ती जाती है. इसे वह लोग 'बनाते' हैं जो हमारे मन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.

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  • Last Updated: November 21, 2019, 9:13 AM IST
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हमारा मन किसके नियंत्रण में रहता है. इस बात का उत्‍तर यही मिलता है, 'मेरे बस में.’ अगर ऐसा होता तो हम क्‍यों किसी के कुछ कहने, बताने, समझाने पर इतने बेकाबू हो जाते कि हमारे दिमाग की नसों में उबाल आने लगता है. धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. मन मुरझा जाता है. शरीर शिथिल पड़ जाता है. एक सूचना, किसी की कही कोई बात, अगर हमें इतना प्रभावित कर देती है तो इसका अर्थ हुआ कि मन हमारे नियमंत्रण में नहीं है.

इसके मायने यह भी हुए कि दिमाग तो हमारा है, लेकिन उसे कंट्रोल कोई दूसरा कर रहा है. वह दूसरा कौन है. जो हमसे अपनी मर्जी का काम करवा लेता है. जब चाहे हमें दुखी कर लेता है. ऐसा करने वाला जो कोई भी है, हमें उसके बारे में सबकुछ पता होना चाहिए.

लेकिन अगर हमने अपने दिमाग की सारी चाबियां किसी दूसरे को थमा दी हैं, तो उनका उपयोग वह अपनी सुविधा, इच्छा से ही करेगा न कि हमारी चेतना के अनुसार. इसीलिए इस बात का खयाल रखना बहुत जरूरी है कि हमारा मन हमारे नियंत्रण में है अथवा उनके नियंत्रण में जो इसे इतना प्रभावित कर देते हैं इस पर से हमारा नियंत्रण खत्म हो जाता है.

हम अक्सर देखते हैं कि घर-परिवार से लेकर नौकरी और व्यापार तक रिश्तों में दूरी अक्सर कुछ कहने, सुनने की जगह मन में 'बनाई गई' धारणा के आधार पर बढ़ती जाती है. इसे वह लोग 'बनाते' हैं जो हमारे मन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. ऐसे में समझना जरूरी है कि मन का नियंत्रण किसके पास है!


हमें कोई अपने मन के हिसाब से 'कैसे' चला सकता है. इस बात का सतर्क भाव हमें बहुत सी उलझनों से बचा सकता है. एक छोटा-सा उदाहरण लेते हैं. आपको कोई कहता है कि आपके बारे में उसने ऐसा कुछ सुना जो अच्छा नहीं है. तो आपकी पूरी ऊर्जा इसी बात में लग जाती है कि किसी तरह जाना जाए कि आखिर कहा क्या गया था! ऐसा करते समय हम पूरी तरह से अपना मन सूचना देने वाले के पास गिरवी रख देते हैं.


कितने ही दिन तक आप उसकी 'बताई' गई सूचना से दुखी होते रहते हैं. गुस्सा होते रहते हैं. जबकि यह भी संभव है कि ऐसा न हुआ हो. आपके संबंधित व्यक्ति से तनाव का फायदा उठाते हुए ऐसी बातें अक्सर कह दी जाती हैं. आपका पूरा ध्यान, ऊर्जा सब चीजों से हटकर केवल उन बातों में लग जाता है जिनमें आपको अपमान का भाव दिखता है. इसे ही हम मन का नियंत्रण दूसरे के हाथ में रखना कहते हैं.
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इसका उलट भी होता है, कोई हमें बताता है कि आपकी बड़ी तारीफ हो रही थी. इस ओर हमारा दिमाग कम जाता है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम नकारात्मकता को सहजता से ग्रहण करते हैं. यही दिमाग का सबसे घुमावदार मोड़ है. हम जितना अभ्यास करेंगे सकारात्मक होने का, उतना ही इस मोड़ से जिंदगी की ओर मुड़ पाएंगे. मन को मजबूत बनाना है. उसे दूसरों की बातें सुनने समझने लायक तो करना है लेकिन इतना कमजोर नहीं बनाना है कि हम बात बात में आहत होने लगें. दुखी होने लगें. मन, हमें छोटी-छोटी चीजों से हारा हुआ घोषित करने लगे. मन के दरवाजे और खिड़कियां ऐसे होने चाहिए कि वह मन को विभाजित, दुखी और तनाव देने वालों को 'बाहर ' से ही लौटा सकें. इससे मन का नियंत्रण अपने पास रखने में सुविधा, सरलता होगी.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 20, 2019, 10:42 AM IST
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