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#जीवनसंवाद: नई कहानी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 15, 2019, 2:11 PM IST
#जीवनसंवाद: नई कहानी!
#जीवनसंवाद: नई कहानी !

Jeevan Samvad: हम शरीर के प्रति जरूरत से अधिक सजग हैं. परिणाम यह हुआ कि अंतर्मन की अनदेखी बढ़ती गई. सारी चेतना बाह्य आकर्षण पर केंद्रित है.

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  • Last Updated: November 15, 2019, 2:11 PM IST
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दीवार घड़ी के बंद होने पर, सुई एक ही जगह अटक जाती है. सेल बदलने के बाद वह दोबारा काम पर लग जाती है. सेल यानी घड़ी की उर्जा धीरे-धीरे धीमी पड़ती है. अक्सर घड़ी पहले धीमे चलना शुरू कर देती है, उसके बाद बंद होने की ओर बढ़ती है. हमारी जिंदगी भी इससे बहुत अलग नहीं है. अंतर केवल इतना है कि अक्सर उसकी धीमी गति के प्रति सजग नहीं होते. हमें लगता है, उसकी गति ठीक है. इसका सबसे बड़ा कारण यह होता है कि हम अपने मन, ऊर्जा की संगत के प्रति सतर्क, सहज नहीं हैं.

हम शरीर के प्रति जरूरत से अधिक सजग हैं. परिणाम यह हुआ कि अंतर्मन की अनदेखी बढ़ती गई. सारी चेतना बाह्य आकर्षण पर केंद्रित है. भीतर से ठोस, गहरे होने की जगह हम खोखले होते जा रहे हैं. ऐसे फूलों की तरह, जिनमें सुंदरता तो है लेकिन सुगंध नहीं. सुगंध रहित फूल आकर्षक होते हैं लेकिन उनका साथ बहुत छोटा होता है!

धम्मपद बुद्ध के सूत्रों का संग्रह है. वह कहते हैं, 'सुंदर लेकिन गंध रहित फूल की तरह उस व्यक्ति के शब्द होते हैं जो खोखली बातें करता है. इसके विपरीत उस व्यक्ति के शब्द किसी सुंदर और सुगंधित फूल की तरह होते हैं जो हृदय से सच बोलता है.' यहां खोखली बातों से अर्थ ऐसी बात से है जिसका हमारे व्यवहार से कोई संबंध नहीं है. बस एक-दूसरे की देखा-देखी हम वही करने लगते हैं जो दूसरों को करते देखते हैं.


जो भी बात हम कह रहे हैं, उसका असर तब तक संभव नहीं, जब तक वह मन की गहराई से ना निकले. प्रशिक्षण से बहुत अच्छा वक्ता होना तो संभव है, लेकिन उनकी बातों का जीवन पर गहरा असर तब तक संभव नहीं, जब तक यह बातें गहरे बोध, सच्चे अनुभव से न निकलीं हों. हम देख रहे हैं कि अधिकांश लोगों की बातों का प्रभाव इसलिए भी कम होता जा रहा है, क्योंकि व्यवहार से उसका संबंध नहीं रह गया है. ऐसी बातों की तुलना ही सुगंधित रहित फूलों से की गई है.

बच्चे को लाख समझाइए, लेकिन वह तब तक आपकी बात नहीं समझे, सुनेगा जब तक वह आपको ऐसा करता हुआ ना देख ले. बच्चों और अभिभावकों के बीच बढ़ते तनाव का कारण यह है कि अभिभावक का व्यवहार बहुत हद तक सुगंध रहित फूल की तरह होता जा रहा है. माता-पिता बातें तो बड़ी कर रहे हैं, लेकिन अपने व्यवहार में बच्चों के लिए मिसाल कायम नहीं कर पा रहे हैं. बच्चे बातों से नहीं, आपके व्यवहार की खुशबू से कहीं गहराई से प्रभावित होते हैं.


इसलिए, रिश्तों में हमें नई कहानी लिखने की ओर बढ़ना चाहिए. इसमें चीजों को कहने की जगह 'करने' पर अधिक जोर देना होगा. रिश्तों में केवल आकर्षण, सुंदरता से बात नहीं बनेगी. सुगंधित फूल की तरह प्रेम में उनका महकना भी जरूरी है. अपने अंतर्मन को पकड़ते, परखते रहिए. उसकी सुगंध को हमें जरा भी कम नहीं होने देना है.
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: November 12, 2019, 12:17 PM IST
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