#जीवन संवाद: मन के खुले द्वार!

#जीवन संवाद: मन के खुले द्वार!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: हम मन के द्वार सबके लिए इसलिए भी नहीं खोलते क्योंकि हमारा मन संकुचित होता है. अक्सर हम सबके लिए एक तरह नहीं सोच सकते. इसे फिर भी व्यावहारिक दृष्टिकोण कह सकते हैं, लेकिन अगर थोड़ी सजगता से देखेंगे, तो पाएंगे कि मन के द्वार धीरे-धीरे इतने संकुचित होते जा रहे हैं कि उनमें कुछ ही लोगों को प्रवेश करने की अनुमति मिलती है.

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हम अक्सर अपने मन के द्वार ऐसे लोगों के लिए ही खुले रखते हैं जो हमारे निकट होते हैं. हमें प्रिय होते हैं. एक ही व्यक्ति का अलग-अलग व्यक्तियों के लिए व्यवहार असल में इसी बात का प्रमाण होता है कि किसी के लिए तो वह मन के द्वार खुले रखता है, रात-दिन. लेकिन बहुत से लोगों के लिए वह अपनी खिड़कियां तक नहीं खोलता. हम सब अलग-अलग परिवेश और स्थितियों में बड़े होते हैं. इसलिए हमारे सोचने समझने के तौर-तरीकों में अंतर बहुत स्वाभाविक है.

हमें बचपन के दोस्त इसलिए भी याद रहते, हमें प्रिय होते हैं क्योंकि वह हमसे अच्छी तरह परिचित हो जाते हैं. कुछ दशक पहले तक हमारा काम अपने बचपन और कॉलेज के दिनों के मित्रों के सहारे चल जाया करता था, क्योंकि हमारी दुनिया का आंगन छोटा था. एक छोटे से शहर, कस्बे में जिंदगी का निबाह आसानी से हो जाता था. लेकिन अब दुनिया बदल गई. हम सब लोग बहुत अधिक उसी तरह जीवन जीने की ओर बढ़ रहे हैं जैसे हम सदियों पहले थे. खानाबदोश जिंदगी. आज यहां, कल वहां. उस वक्त हमारे मन आज के मुकाबले निश्चित रूप से खुले रहे होंगे. इस बात की पुष्टि आप ऐसे लोगों से कर सकते हैं जो बहुत अधिक यात्राएं करते हैं.

दुनिया के महान यात्री इस बात को दोहराते रहे हैं कि ऐसे लोगों में सहज विश्वास, प्रेम और परख करने की क्षमता कहीं अधिक गहरी होती है जो अलग-अलग जगहों से गुजरते रहते हैं. व्यक्तियों को वह ऐसे ही पहचान लेते हैं, जैसे हम अपने आसपास रहने वाले समाज से परिचित होते हैं.




हम मन के द्वार सबके लिए इसलिए भी नहीं खोलते क्योंकि हमारा मन संकुचित होता है. अक्सर हम सबके लिए एक तरह नहीं सोच सकते. इसे तो फिर भी व्यावहारिक दृष्टिकोण कहकर हम अपने भीतर झांकने से बच सकते हैं, लेकिन अगर थोड़ी सजगता से देखेंगे, तो पाएंगे कि मन के द्वार धीरे-धीरे इतने संकुचित होते जा रहे हैं कि उनमें कुछ ही लोगों को प्रवेश करने की अनुमति मिलती है.


गांव-देहात में हम देखते हैं कि लकड़ी के दरवाजों का आकार बारिश के दिनों में अपने आप बढ़ जाता है, इस वजह से दरवाजे अच्छी तरह बंद नहीं हो पाते. लेकिन यही दरवाजे गर्मी के मौसम में फिर से अपने आकार को प्राप्त हो जाते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि लकड़ी में अपने को मौसम के अनुसार ढालने की क्षमता है!

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जब लकड़ी में यह क्षमता है तो मनुष्य के मन के भीतर ऐसी क्षमता न हो, इससे इनकार करना थोड़ा मुश्किल है. वैसे लकड़ी और मनुष्य एक-दूसरे के बड़े नजदीक हैं. हमारा मन भी ऐसे ही अलग-अलग मौसम के अनुसार व्यक्तियों का चयन करता रहता है. लेकिन इसमें सावधानी की जरूरत है. अक्सर हम ऐसे लोगों की आलोचना करते हैं जो हमें अपने सुख के समय भूल जाते हैं, लेकिन दुखी होने पर तुरंत याद करते हैं! बहुत से लोग अपने मन के द्वार स्थितियों के अनुसार लकड़ी की तरह ही बढ़ाते-घटाते रहते हैं. संभव है कि भौतिक रूप में आपको इसका कुछ फायदा मिल जाए, लेकिन जीवन के सुख से इसका कोई रिश्ता नहीं है.

मन के दरवाजे को स्थायी, संवेदनशील और स्नेहिल बनाइए. इसमें दूसरों के 'हिसाब-किताब' से अधिक करुणा, प्रेम और क्षमा होनी चाहिए. हम एक-दूसरे को पराजित करने के खेल से जितनी जल्दी बाहर निकल पाएंगे, मनुष्य के रूप में उतने ही अधिक बेहतर होते जाएंगे!


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