#जीवन संवाद: अतीत के धागे!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 9, 2019, 9:50 AM IST
#जीवन संवाद: अतीत के धागे!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने अतीत से हमें केवल यह सीखना है कि उन गलतियों को ना दोहराया जाए, जिनसे हमें पीड़ा मिली. इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने मन को आशंका और अविश्वास से भर लें. बल्कि केवल इतना है कि अपने निर्णयों के प्रति कहीं अधिक सजग और आत्मविश्वास ही बना जाए.

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हम किस बात से सबसे अधिक दुविधा, असहज, उलझे रहते हैं. खुद को सजगता से टटोलने पर उत्तर मिलता है, अतीत! अपने वर्तमान से तनिक भी असंतुष्ट होते ही हम अतीत के गलियारे में टहलने लगते हैं. अतीत के धागे कई बार मन से ऐसे उलझ जाते हैं कि जिंदगी की सुगंध, मुस्कान फीकी पड़ने लगती है. इसलिए अतीत को सजगता से संभालने की जरूरत है. अतीत की जुगाली से हम केवल अपनी पीड़ा को ही पुनर्जीवित करते रहते हैं. पुराने घाव को बार-बार सहलाने से हमें लगता है, वह ठीक हो रहा है, जबकि ऐसा न होकर वह हरा ही बना रहता है. उल्टे हम पुराने घाव से वर्तमान को घायल करते रहते हैं. इसलिए, हमें अपने अतीत का ठीक तरह से प्रबंधन जरूरी है. आइए, समझते हैं कि इसे कैसे किया जाए.

हमें अतीत की उस पाइपलाइन को वर्तमान से पूरी तरह काटने की जरूर है, जो आज के जीवन में बाधा उत्पन्न कर रही है. यह आसान नहीं है, लेकिन थोड़े अभ्यास के साथ इसे हासिल किया जा सकता है. अतीत के पन्नों से जो अक्सर हवा के झोंकों से पलट कर वर्तमान में दखलअंदाजी करने लगते हैं, दृढ़ता से जीवन से दूर करने की जरूरत होती है. खुद के प्रति ईमानदारी, दृढ़ता और अपने बनाए हुए मूल्य पर टिके रहने से इसे सरलता से हासिल किया जा सकता है.

हम अक्सर दूसरों के प्रति निर्मम, अपने प्रति उदार होते हैं. जबकि व्यक्तित्व निर्माण से लेकर मनुष्य बनने की प्रक्रिया तक इस नियम को पलटने की जरूरत है. अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार होने की दरकार है. जिन संबंधों में प्रेम और आत्मीयता की सघनता रही हो, उनसे अतीत की मुक्ति बहुत मुश्किल होती है. जैसे लहरों के भंवर में अच्छे-अच्छे नाविक घबराने लगते हैं, वैसे ही ऐसे संबंधों में अतीत बार-बार हमारे उजले वर्तमान पर अमावस्या का अंधेरा फेंकने में जुटा रहता है.

अपने अतीत से हमें केवल यह सीखना है कि उन गलतियों को ना दोहराया जाए, जिनसे हमें पीड़ा मिली. इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने मन को आशंका और अविश्वास से भर लें. बल्कि केवल इतना है कि अपने निर्णयों के प्रति कहीं अधिक सजग और आत्मविश्वास ही बना जाए.


अपने निर्णय खुद करना और उनके जैसे भी परिणाम हों, उनके लिए केवल स्वयं को जिम्मेदार मानना अतीत से मुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. जो हो गया, उसे बदला तो नहीं जा सकता, लेकिन उसकी याद में हम वर्तमान की सुनहरी आशा को अनंत काल तक प्रतीक्षा करने की अनुमति नहीं दे सकते. इसलिए, स्वयं पर भरोसा, जिस पर अटूट विश्वास है, उसके साथ से हमें वर्तमान के आंगन में स्वयं को झोंक देने की जरूरत है. हम अगले अंकों में भी अतीत से मुक्ति पर संवाद करते रहेंगे. आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है.

एक छोटी सी सूचना भी. सात सितंबर की दोपहर बेहद सार्थक रही. भोपाल में मनमोहक हरियाली के बीच बसे सीआरपीएफ के बंगरसिया परिसर में 'जीवन संवाद' का अवसर मिला. हमने जीवन, अवसाद और डिप्रेशन से जुड़े विषयों पर संवाद किया. 400 से अधिक प्रतिभागियों की मौजूदगी में हमने उदासी, निराशा, अवसाद और आत्महत्या से जुड़े सवालों पर संवाद किया. इसमें सबसे अधिक जटिल, गहरे सवाल अतीत को लेकर सामने आए. अतीत के आंगन में ताला लगाए बिना वर्तमान के द्वार पर सुकून से बैठना संभव नहीं. इसलिए इसे अधूरा मत छोड़िए!

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 9, 2019, 9:47 AM IST
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