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#जीवनसंवाद: कुछ धीमा होने का सुख !

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 18, 2019, 12:09 PM IST
#जीवनसंवाद: कुछ धीमा होने का सुख !
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: तेज़ होने में कुछ भी खराब नहीं है, जब तक आप गति के साथ गुणवत्ता को नहीं छोड़ते. संकट वहीं खड़ा होता है, जहां गति को ही सब कुछ मान लिया जाता है.

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  • Last Updated: September 18, 2019, 12:09 PM IST
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कुछ शब्दों ने आहिस्ता-आहिस्ता जिंदगी में प्रवेश किया, लेकिन बहुत तेजी से हमें बदलते चले गए. ऐसा ही एक शब्द है, तेज़! सबसे तेज! एक तरफ सबसे तेज़ होने का मुहावरा तकनीक, बाजार गढ़ रहे थे तो दूसरी ओर 'फास्ट फूड' जिंदगी में दाखिल हो रहा था. एक ही बात पर सबसे अधिक जोर था, सबसे पहले! विचार से लेकर भोजन तक, हमारी दृष्टि केवल तेजी पर आधारित रही.

अस्सी-नब्बे के दशक में जन्मी पीढ़ी, जिन्हें मिलेनियल्स (जनरेशन Y) के नाम से भी जानते हैं, उनका विश्वास सबसे अधिक इस तेजी, गति पर ही है. गुणवत्ता गति के मुकाबले हमारी प्राथमिकता से बाहर होती जा रही है. आप अपने आसपास जिससे भी बात करते हैं, हर कोई व्यस्त है. उसके पास समय नहीं है. जबकि पहले के मुकाबले जिंदगी की दूसरी जरूरतों में लगने वाला समय न्यूनतम हो गया है.

पहले बैंक, टिकट और बिल के काम पूरे करने में बहुत वक्त लगता था. साथ ही सफर में भी समय लगता था, क्योंकि वह धीमा था. अब सबकुछ तेज़ हो गया तो जीवन अधिक सुलझा, सरल और आनंदित होना चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. समय गया कहां! ‌



यह सवाल भारत के साथ ही पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है. हम तेज़ी की ओर इतनी तेज़ी से दौड़ रहे हैं कि हमारे जीवन में दुख, संदेह, अवसाद और हिंसा बढ़ती जा रही है. हम गुणवत्ता से दूर हो रहे हैं इसलिए हमारा ध्यान इस ओर जाता ही नहीं.


कुछ दिन पहले सुपरिचित रंगकर्मी मोहन जोशी के साथ सुंदर संवाद का अवसर मिला. उन्होंने बड़ी दिलचस्प बात कही, 'आजकल मैं किसी काम में तेज़ी नहीं करता. तेजी से स्वाद का साथ छूट जाता है. मैं खुद को धीमा करने की कोशिश कर रहा हूं. इससे जीवन में गहरी सकारात्मकता के साथ गुणवत्ता, उसके स्वाद पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा.'

हमने जैसे-जैसे गुणवत्ता को छोड़, गति की ओर कदम बढ़ाए जीवन में सुख, शांति की जगह संदेह, सबकुछ हासिल करने की ललक ने ले ली. तेज़ होने में कुछ भी खराब नहीं है, जब तक आप गति के साथ गुणवत्ता को नहीं छोड़ते. संकट वहीं खड़ा होता है, जहां गति को ही सब कुछ मान लिया जाता है.

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मेरे विचार में हम सब भीतर से अधीर होते जा रहे हैं. धैर्य की कमी, आत्मीयता और अपनेपन का अभाव हमेंं सब कुछ गति में झोंकने के लिए उकसाते रहते हैं. इससे बचनेे के उपाय खोजने होंगे. समय के साथ चलने का तेज़ होने से कोई संबंध नहीं है. यह केवल भ्रम है! इसके प्रति सतर्क रहिए!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 18, 2019, 8:48 AM IST
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