#जीवनसंवाद: मुश्किल और समय!

#जीवनसंवाद: मुश्किल और समय!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने हिस्से का दोष हम समय पर नहीं फेंक सकते. जीवन की हमारी यात्रा इतनी घुमावदार, रहस्य और रोमांच से भरी हुई है कि उसमें समय को दोष देने के लिए उसकी पटकथा में जबरन बदलाव करने पड़ते हैं! मुश्किल और समय को अलग करके देखिए सुख के नए दृष्टिकोण मिलेंगे!

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 1, 2020, 7:19 PM IST
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कोई भी समय हमारे लिए मुश्किल तब हो जाता है, जब उन लोगों से सहयोग मिलना बंद हो जाए, जो हमेशा साथ खड़े रहने का वादा करते हैं. हमें ऐसा लगता जरूर है, लेकिन समय नहीं बदलता. उसके स्वभाव में बदलना है ही नहीं. वह तो केवल चले जा रहा है, जैसे कोई यात्री चुपचाप अपनी लंबी यात्रा पर है. मेरे ख्याल में अच्छे समय और मुश्किल वक्त में केवल इतना ही फर्क है कि अच्छे वक्त में मुश्किल लोग भी आपके साथ आ जाते हैं. उनके साथ आपके रिश्ते निभ जाते हैं. जबकि मुश्किल वक्त में ऐसे लोग ही हमसे दूर हो जाते हैं जिनके लिए सारा घोंसला बुना गया था! तो इसके लिए वक्त जिम्मेदार नहीं हुआ. इसके लिए तो लोगों का चरित्र उत्तरदायी है.

कभी-कभी समय और समंदर एक सरीखे नजर आते हैं. उतने ही गंभीर, शांत, बलशाली लेकिन धैर्य से भरे हुए. इसलिए विपरीत परिस्थितियों के जीवन में आने को लेकर हमें समय से मुक्त संवाद करना चाहिए. अपने हिस्से का दोष हम समय पर नहीं फेंक सकते. जीवन की हमारी यात्रा इतनी घुमावदार, रहस्य और रोमांच से भरी हुई है कि उसमें समय को दोष देने के लिए उसकी पटकथा (स्क्रिप्ट) में जबरन बदलाव करने पड़ते हैं! मुश्किल और समय को अलग करके देखिए सुख के नए दृष्टिकोण मिलेंगे!

समय नदी की तरह है. बहे जा रहा है. नदी के साथ नाव भी बहती है. लकड़ी का टुकड़ा भी बहता है. जीव-जंतु भी बहते रहते हैं. नदी किसी के साथ नहीं बहती. हां, नदी के साथ सब बहते हैं. सबकी अपनी दिशा है. नदी को दूसरों से कोई सरोकार नहीं. नदी को बैर भी नहीं. नदी सरोकार और बैर से दूर है! बहना ही उसका जीवन है. समय का स्वभाव, चरित्र भी ऐसा ही है. इसलिए जीवन में ऐसे लोग अधिक संख्या में सुख को उपलब्ध होते हैं, जो अपने सुख के लिए बार-बार समय की ओर नहीं देखते.




#जीवनसंवाद: प्रिय सुख! जब तुम आना!
एक छोटी-सी कहानी आपसे कहता हूं. संभव है, इससे मेरी बात आपको अधिक सरलता से स्पष्ट हो जाएगी. एक गांव के बाहर एक बैलगाड़ी आकर रुकी. इसमें से परिवार का मुखिया बाहर निकलकर आया. उसने गांव के प्रवेश मार्ग पर बैठे बुजुर्ग से कहा कि मुझे इस गांव में ठहरने की जगह चाहिए. बुजुर्ग ने कहा पहले यह बताइए कि कहां से आना हो रहा है और क्यों आपको अपना गांव छोड़ना पड़ा!

उन सज्जन ने कहा जिस गांव में मैं रहता था, उस गांव के लोग मुश्किल वक्त में मेरा साथ छोड़ गए. बहुत ही असभ्य लोग हैं. मुश्किल वक्त में काम नहीं आए, इसलिए मैंने गांव छोड़ने का फैसला किया. बुजुर्ग ने कहा इस गांव के लोग तो तुम्हारे गांव से भी खराब व्यवहार वाले हैं. बेहतर होगा कि तुम किसी दूसरे गांव की ओर चले जाओ.

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थोड़ी देर बाद एक ऐसी ही बैलगाड़ी फिर आकर रुकी. बुजुर्ग ने उनसे भी वही प्रश्न किया. बैलगाड़ी से उतरे व्यक्ति ने विनम्रतापूर्वक कहा, जहां से मैं आ रहा हूं वहां के लोगों ने हमेशा मुझे आदर और प्रेम दिया. उस गांव पर मुश्किल वक्त आ पड़ा है. अकाल के समय लोग कहां एक-दूसरे की इतनी मदद कर पाते हैं, जितनी मदद उस गांव ने की. मेरी सहनशक्ति ऐसी नहीं है कि मैं वहां रहते हुए अधिक कष्ट सह पाता, इसलिए न चाहते हुए भी मैं गांव से बाहर आ गया. मैं किसी को दोष नहीं देता!

उस यात्री ने अपनी बातें स्पष्ट करते हुए कहा, 'समय निर्विकार है. हम अपने साहस और धैर्य के साथ स्वयं अपनी स्थितियों का निर्माण करते हैं. एक ही जैसी धूप होती है, एक फूल खिल जाता है, धूप पाकर. एक फूल ऐसा भी होता है जो सूरज के साथ ही अपनी दिशा बदलता रहता है. कुछ फूल धूप में कुम्हला जाते हैं. सबके लिए सूरज को कैसे जिम्मेदार कहा जा सकता है!'

बुजुर्ग ने आगे बढ़कर उसका स्वागत करते हुए कहा, 'इस गांव में तुम्हारा स्वागत है. तुम्हारा जीवन और सुख के प्रति दृष्टिकोण एकदम स्वस्थ है. इस गांव को ऐसे ही लोगों की जरूरत है, जो समय को दोष देने की जगह अपने निर्णय और धैर्य से मुश्किल से मुश्किल तूफान का भी सामना कर पाएं.'

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