#जीवनसंवाद: डरावने अनुभव से उबारना! ‌

#जीवनसंवाद: डरावने अनुभव से उबारना! ‌
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने आसपास लोगों पर थोड़ी नजर दौड़ाएं. आप पाएंगे कि करुणा की बहुत कमी है. प्यार तेजी से कम होता जा रहा है. प्यार की कमी ही हमें कठोर बनाती है. हमारे व्यक्तित्व को शीतलता की जगह कठोरता और चिड़चिड़ाहट से भर देती है.

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जीवन में हमारे हिस्से आने वाले खराब, डरावने अनुभव से निकलना आसान नहीं होता लेकिन जो लोग ऐसा कर पाते हैं उनका जीवन बहुत अधिक सहज होता जाता है! आसान नहीं होता जिंदगी में कुछ भी! हमें लगता जरूर है. संवाद का इतना महत्व इसीलिए है. मैंने कुछ ही लोगों को ऐसी अवस्था को प्राप्त होते देखा है जो दुखद अनुभव को बहुत जल्द दिमाग से हटा देते हैं. हटाने में सक्षम हैं.

अनुभव तो अनुभव हैं. अच्छे/बुरे जैसे भी हैं वह केवल अनुभव हैं. हमारे मन की ट्रेनिंग कुछ ऐसी है कि हम अच्छे को तो संभाल कर रख लेते हैं मन की गहराई में, लेकिन बुरे को हमेशा चेतन मन में तैरने देते हैं. यह ठीक वैसे ही है, जैसे अच्छे नोटों को तो हम दबा कर रख लेते हैं लेकिन कटे-फटे खराब नोटों को मार्केट में चलाने की कोशिश में लगे रहते हैं.

#जीवनसंवाद: प्रेम और अकेलापन!



इसीलिए, बाज़ार में कटे फटे नोट ज्यादा देखते हैं. क्योंकि साफ-सुथरे नोट घर में होते हैं. 'जीवन संवाद' में अक्सर स्मृति के उजाले पर जोर दिया जाता है. कुछ तो अच्छा जीवन में घटा ही है. किसी एक दिन तो प्रेम मिला ही है. एक दिन न सही एक पल तो प्रेम में डूबा बीता ही है! वह पल क्या हुआ!

अपने आसपास लोगों पर थोड़ी नजर दौड़ाएं. आप पाएंगे कि करुणा की बहुत कमी है. प्यार तेजी से कम होता जा रहा है. प्यार की कमी ही हमें कठोर बनाती है. हमारे व्यक्तित्व को शीतलता की जगह कठोरता और चिड़चिड़ाहट से भर देती है. अगर कोई व्यक्ति मिले जिसे बहुत अधिक क्रोध आता है तो उसके अतीत में थोड़ा झांक कर देखिए बचपन में जरूर ही उसे कुछ ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा होगा जहां प्रेम की कमी रही होगी. जिनको बचपन में प्रेम नहीं मिलता वह अक्सर बड़े होकर शंकालु और कठोर होते जाते हैं दूसरों के प्रति! दूसरी ओर इसके उलट जिन्हें बचपन में भरपूर प्रेम मिला हो उनके भीतर कोमलता और सहृदयता के पुष्प सहज खिलते रहते हैं.


मन का कठोर होते जाना, उसका दलदल बनते जाना है! हम दलदल से जितना बाहर आने की कोशिश करते हैं, उतने ही धंसते हैं. उसके लिए मजबूत सहारे की जरूरत होती है जो बाहर खींच सके! प्यार ही एकमात्र सहारा है, जो कठोरता के दलदल से बाहर लाने की क्षमता रखता है!


एक मित्र हैं. बचपन में उनको बड़ी कठोर परिस्थितियों का सामना कर पड़ा. परिणाम यह हुआ कि जब युवा होकर वह हमें मिले तो हमने पाया कि उनका मन संदेह से भरा हुआ है. उनके मन में यही समाया आ रहा कि सारी दुनिया उनके विरुद्ध है. उनकी स्थिति कुछ ऐसी हो गई कि जैसे पेड़ में उस पत्ते की हो जाती है जो उस वक्त विश्राम करना चाहता है जब पेड़ हवा में झूमना चाहता है. यहां तनाव तो होगा ही. ठीक इसी तरह जब पेड़ विश्राम करना चाहे और पत्ता झूमना चाहे तो तनाव और संघर्ष पैदा होगा. पत्ते को या तो संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए अन्यथा उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए. शिकायत करने से हमारा मन निरंतर कमजोर होता जाता है. दूसरी ओर जीवन के प्रति आस्था से ही जीवन को शक्ति मिलती है!

जिनके मन में कठोरता का दलदल है, वह कैसे बाहर निकलेंगे! मन कैसे उदार और अनुरागी बनेगा. इसका एक ही तरीका है, प्यार और स्नेह. आसान नहीं है लेकिन असंभव भी तो नहीं है. मन को डरावनी और छली गई यादोंं से निकाल पाना. लेकिन जीवन के हित में इसे करना होगा.


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आपके नजदीक ऐसे जो भी लोग हैं उनकी मदद कीजिए उस दलदल से बाहर निकलने की जिससे अगर वह बाहर न निकल पाए तो दलदल का दायरा बढ़ता ही जाएगा. यह खतरा हम लोगों से बहुत अधिक दूरी पर नहीं हैं! शुभकामनाओं सहित...

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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