#जीवन संवाद: अकेले बच्चे की डायरी!

पैसे को हम जरूरत से बहुत ज्यादा महत्व देते हैं. धन केवल सुविधा का विस्तार दे सकता है, उसकी गुणवत्ता, उससे उपजा प्रेम मनुष्य के अतिरिक्त किसी से संभव नहीं है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 15, 2019, 11:41 AM IST
#जीवन संवाद: अकेले बच्चे की डायरी!
#जीवन संवाद: अकेले बच्चे की डायरी!
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 15, 2019, 11:41 AM IST
अक्सर उसे अकेले ही घूमते देखा है! बच्चों को इस तरह कम ही टहलते देखा है. दस साल की बच्ची कॉलोनी में अक्सर ही अकेले आती-जाती दिखती है. वह स्कूल में बच्चों की सहपाठी है, इसलिए सहज परिचय है. माता-पिता बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित आश्रय होते हैं. सबसे अच्छे माता-पिता वह होते हैं, जिनके पास थोड़ा समय भी होता है. थोड़े से अतिरिक्त समय से जीवन को बहुत सारा प्रेम दिया जा सकता है. बशर्ते, हम ऐसा करना चाहते हों. हमारी कॉलोनी में होने वाले हर आयोजन में, भारी भीड़ के बीच भी उसे मैंने अक्सर ही बच्चों के बीच अकेले खेलते हुए देखा है. कुछ दिन पहले उसने मेरी बेटी से कहा, 'अगले साल वह हॉस्टल चली जाएगी. उसे हॉस्टल का जीवन बहुत अच्छा लगता है.'



मेरी बेटी ने मुझसे कहा, 'आप तो कहते हैं हॉस्टल में बच्चों की ठीक से देखभाल नहीं की जाती है. लेकिन मेरी दोस्त वहां जाने के लिए तैयार हो रही है, उसे हॉस्टल के बारे में सारी अच्छी बातें पता है.' हम बड़े एक चीज़ में बहुत पारंगत होते हैं, हमें दुनिया जैसी समझ में आती है, बच्चों को वैसे ही समझाने लगते हैं! संभव है, उस बच्ची को घर से बाहर भेजने की तैयारी में माता-पिता ने यह सब समझाया हो.

किसी बच्चे को कहां-कैसे पढ़ाना है, यह माता-पिता का दायित्व है, जिम्मेदारी है. लेकिन ऐसे माता-पिता के लिए जो अपने बच्चे का ध्यान सहज रूप से रखने में सक्षम हों, उनके लिए बच्चे को अपने से दूर रख कर पढ़ाना उसके साथ अन्याय जैसा है. यह कुछ ऐसा है कि आप घर में खूब सुंदर-सुंदर फूल उगाएं, फिर उसे बड़ा करने की जिम्मेदारी पड़ोसी को दें. समय देख पड़ोसी को आप इसके बदले में कुछ रकम भी देते हों, इससे यह तो यह तो नहीं होगा कि पड़ोसी आपके जैसी भावना से ही पौधों का खयाल रखें.

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बच्चों को बाहर की उस कठोर दुनिया के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, जिस पर स्वयं आपका विश्वास नहीं है.


पैसे को हम जरूरत से बहुत ज्यादा महत्व देते हैं. धन केवल सुविधा का विस्तार दे सकता है, उसकी गुणवत्ता, उससे उपजा प्रेम मनुष्य के अतिरिक्त किसी से संभव नहीं है.


हम जिस बच्ची की बात कर रहे हैं, वह बहुत ही सहज लेकिन भीतर से कुछ परेशान सी है. उसके प्रश्न बहुत मौलिक हैं लेकिन उत्तर सारे हमारी 'योजना' के अनुसार. अगर हमारे पास समय नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चे को आप दूसरे पर थोप दें. मैं यहां जिस संदर्भ में बात कर रहा हूं, उसकी पूरी परिस्थिति से परिचित हूं.
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कुछ खास स्थितियों में बच्चे को बाहर रखने का निर्णय सही हो सकता है. लेकिन इसका उपयोग केवल इसलिए कि बड़ों को अपने सपनों से फुर्सत नहीं है, उचित नहीं कहा जा सकता.

बच्चों को बाहर की उस कठोर दुनिया के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, जिस पर स्वयं आपका विश्वास नहीं है. कुछ पाठकों को शायद यह विचार उचित न लगे, बच्चे को दूर रख कर पाने के हिमायती हो सकते हैं, लेकिन इस बात से वह भी सहमत होंगे कि बच्चे को जो प्रेम, आत्मीयता आप से मिल सकती है, आपके साथ मिल सकती है, वह आपसे दूर रहकर संभव नहीं.

एक समाज के रूप में हमारी समस्या यह है कि हम फिल्म, नाटक से कुछ सीखते नहीं. बच्चों के साथ 'तारे जमीं पर' देख आते हैं, उसके गीत गुनगुनाते हैं. कुछ दिन उसके बारे में बात करते हैं. उसके बाद अपने बच्चे को हॉस्टल भेजने की तैयारी करने लगते हैं. उससे वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं, जैसा हमें फिल्में अच्छा नहीं लग था.


हम 'डियर जिंदगी : जीवन संवाद' में निरंतर इस बात को दोहराते रहे हैं कि, 'बच्चे हमसे हैं, हमारे लिए नहीं'. बच्चों के प्रति दायित्व हमारे हैं, क्योंकि हमने उन्हें अपनी खुशी के लिए चुना है. बच्चे को हमने चुना है, बच्चे ने हमें नहीं. बच्चे के सपनों पर से अपना अधिकार हमें छोड़ना होगा. उसके लिए अतिरिक्त चिंता से पार जाना होगा. जो बच्चे को देना संभव है, उसे दीजिए. उसके लिए अपेक्षा का अतिरिक्त भार अपने और उसके मन पर डालने से दोनों को ही केवल नुकसान होगा!

जहां तक संभव हो बच्चों को बहुत अधिक कोमलता, स्नेह और प्रेम दीजिए! इसके अतिरिक्त उन्हें जो चाहिए वह स्वयं अर्जित कर लेंगे. इस बात में भरोसा हमें बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में आगे ले जाएगा.

 
पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 15, 2019, 10:49 AM IST
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