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#जीवनसंवाद : दुख कहां लिखा जाए!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 18, 2019, 9:24 AM IST
#जीवनसंवाद : दुख कहां लिखा जाए!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने दुख को हमने चट्टान पर लिख रखा है. सुख को रेत पर. दुख मन में गहरे उतरा रहता है. सुख को समय की लहर मिटाती रहती है. मन कड़वा, भारी होता जाता है.

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  • Last Updated: September 18, 2019, 9:24 AM IST
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सुख को याद करते हुए हम भीतर से पुलकित हो जाते हैं. कई बार मन ही मन मुस्‍कराने लगते हैं. लेकिन इसके बाद भी सुख का खयाल छोटा ही होता है. जबकि इसके उलट दुख का खयाल होते ही हम कहीं गहरे उतर जाते हैं. भीतर तक चले जाते हैं. हमें वहां से बाहर आने के लिए अक्‍सर किसी सहारे की जरूरत महसूस होती है. सुख का समय छोटा, मुलायम, जबकि दुख का वक्‍त गहरा, नुकीला होता है. यह बात बचपन से सिखाई जा रही है कि दुख के समय खुद को संभालिए. लेकिन कैसे, इस पर बात नहीं होती.

दुख सत्‍य है. उसे स्‍वीकार करने की बात एक तरह से थ्‍योरी है. आज हम इसके प्रैक्टिकल की बात करते हैं. दुख का सामना कैसे किया जाए. एक छोटी सी कहानी सुनते चलिए. अगर पहले कहीं पढ़ी है, तो एक दुहरा लीजिए.

यह परिवार समंद किनारे रहता था. दो भाई थे. बड़ा साहसी, समझदार था. छोटा, संवेदनशील, सहज. दोनों हर दिन समंदर किनारे पसरी रेत पर खेलने जाते. एक दिन किसी बात पर बड़े भाई ने छोटे भाई को थप्‍पड़ मार दिया. छोटा भाई ने दुखी होते हुए रेत पर लिखा, ‘आज, भाई ने मुझे मारा’. कुछ दिन वहीं अचानक तेज़ लहरों ने छोटे भाई को घेर लिया. छोटा भाई डूबने लगा. बड़े ने अपनी परवाह किए ब‍िना उसकी जान बचाई. जब दोनों भाई वहां से घर चलने को हुए तो वहां पड़ी एक चट्टान पर छोटे ने लिखा, ‘आज भाई ने मेरा जीवन बचाया.‘

बड़े को आश्‍चर्य हुआ. उसने कहा, जब तुमको मारा तो तुमने रेत पर लिखा. जब बचाया तो चट्टान पर. ऐसा किसलिए?

छोटे भाई ने कहा, ‘जब तुमने थ्‍प्‍पड़ मारा तो दुख हुआ. उसे रेत पर लिखा, ताकि कुछ देर में मिट जाए. हमें दुख को रेत पर ही लिखना चाहिए. इससे उसकी याद जल्‍दी मिट जाती है. जब तुमने मेरी जान बचाई, तो चट्टान पर लिखा, जिससे यह हमेशा याद रहे कि तुमने मेरे लिए क्‍या किया था. सुख को बड़ा बनाइए. दुख को क्षणिक. छोटा. उसकी स्मृति छोटी रखिए.’

कहने को यह कहानी है. लेकिन थोड़ा ठहरकर अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए. हमने अनजाने में कैसा उल्‍टा काम किया है.

अपने दुख को हमने चट्टान पर लिख रखा है. सुख को रेत पर. दुख मन में गहरे उतरा रहता है. सुख को समय की लहर मिटाती रहती है. मन कड़वा, भारी होता जाता है.   यह प्रक्रिया सरल नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं कि यह संभव न हो. मन के प्रति थोड़ी सी वैज्ञानिक सोच अपनाकर हम इस दृष्टिकोण को हासिल कर सकते हैं. इसे प्रयोग की तरह जीवन में अपनाएं, अपने अनुभव लिखकर भेजें.
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 17, 2019, 8:42 AM IST
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