#जीवनसंवाद: कम नंबर वाले बच्चे!

#जीवनसंवाद: कम नंबर वाले बच्चे!
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Jeevan Samvad: एक बच्चे के भीतर स्कूल में प्रदर्शन से अधिक उसकी नैसर्गिक प्रतिभा, साहस, संवेदनशीलता, कोमलता और नेतृत्व क्षमता का होना कहीं अधिक जरूरी है. स्कूल के नंबर के सहारे बच्चे का मूल्यांकन करना बहुत ही अन्याय पूर्ण और क्रूरतम व्यवस्था है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 15, 2020, 10:50 PM IST
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इस समय हर तरफ ऐसे बच्चों की तस्वीरें माता- पिता साझा करने में व्यस्त हैं, जिनमें उनके बच्चों के नंबरों का गुणगान किया जा रहा है. पहली नजर में यह बच्चों का मामला लगता है लेकिन थोड़ा ध्यान से देखने पर स्पष्ट होता है कि यह अपनी प्रतिष्ठा की कहानी अधिक है! माता-पिता इस बात के लिए खुद को शाबाशी देना चाहते हैं कि उन्होंने किस तरह अपने बच्चे का ख्याल रखा है. यह बच्चे की नहीं अपनी प्रतिष्ठा का चौपाल है.

सब तरफ उन बच्चों की बात हो रही है जिनकी संख्या बहुत कम है लेकिन उनकी प्रतिष्ठा के काफ़िले में उनके सगे संबंधी, शिक्षक, माता-पिता सब शामिल होना चाहते हैं. इसके उलट ऐसे बच्चे बड़ी संख्या में जिनके नंबर 'आज' के हिसाब से कम आए हैं. कितनी विचित्र बात है कि अब 80% अंकों को भी कम माना जा रहा है. हम स्कूलों के दिखाए सपने में इतने डूबे हैं कि बच्चों के प्रति अमानवीय होते जा रहे हैं. दुनिया का इतिहास इस बात की स्पष्ट गवाही देता है कि स्कूल में प्रदर्शन का उसके नायकों से कोई रिश्ता नहीं है. बच्चे को स्कूल में मिलने वाली सफलता बहुत ही छोटी चीज है. बच्चे पर इसकी छाया कम से कम पड़नी चाहिए!


आप और हम आज जहां भी हैं. वहां होने में आपके स्कूल के नंबरों की भूमिका मामूली है. लगभग न के बराबर.भारत की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में इन नंबरों का कोई योगदान नहीं. इनके आधार पर किसी उम्मीदवार को कोई महत्व नहीं दिया जाता. क्योंकि जीवन में अधिक महत्वपूर्ण गुणों का योगदान है. एक बच्चे के भीतर स्कूल में प्रदर्शन से अधिक उसकी नैसर्गिक प्रतिभा, साहस, संवेदनशीलता, कोमलता और नेतृत्व क्षमता का होना कहीं अधिक जरूरी है.

स्कूल के नंबर के सहारे बच्चे का मूल्यांकन करना बहुत ही अन्याय पूर्ण और क्रूरतम व्यवस्था है. ऐसा नहीं कि केवल भारत में ही यह सब हो रहा है. दुनिया के अनेक देशों में बच्चों को स्कूल में दी जाने वाली यातना की ऐतिहासिक कहानियां मौजूद हैं. फ्रांस के महानतम लेखकों में से एक अनोरो द बाल्ज़ाक की जीवन गाथा 'वाइन ऑफ लाइफ' में इस बात का विस्तार से उल्लेख है कि फ्रांस में 18 वीं शताब्दी में ऐसे स्कूल मौजूद थे, जहां बच्चों की पिटाई कैदियों को पीटे जाने वाले चाबुक से की जाती थी.



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दस-बारह साल के बच्चे को इतनी क्रूरता से केवल इसलिए पीटा जाता था, क्योंकि उसका ध्यान गणित में ना होकर लेखन और कला की ओर था. यह भारतीय और विश्व साहित्य में बच्चे की पिटाई की क्रूरतम कहानियों में से एक है.

वैसे भारत में भी बच्चों की पिटाई के भरपूर एक्शन दृश्य मौजूद रहे हैं. मुझे यह कहते हुए तनिक भी संकोच नहीं होता कि मेरे स्वयं कुछ ऐसे शिक्षक रहे जो कुछ बच्चों की पिटाई केवल इसलिए करते थे क्योंकि उस दिन उनका मिजाज ठीक नहीं हुआ करता था. दूसरे बच्चों में खौफ पैदा हो, अनुशासन बना रहे इसलिए कुछ बच्चों को जानबूझकर समय-समय पर किसी न किसी बहाने पीटने का रिवाज़ रहा. इसका मैं स्वयं ही गवाह हूं.

इतना ही नहीं बच्चों में इस पिटाई के लिए इतना सामाजिक भय होता था कि बच्चे एक-दूसरे से कहा करते थे कि घर पर यह बात नहीं पहुंचनी चाहिए. क्योंकि अगर किसी तरह यह बात घर पहुंच जाए तो वहां पर न जाने किस चीज़ से परेशान पिताजी बच्चे पर टूट पड़ते थे. बच्चों को किसी ना किसी बहाने कूटने की भारत में अद्भुत परंपरा है. हम बच्चे के अधिकार के प्रति इतने अधिक असंवेदनशील समाज हैं कि सारा गुस्सा बच्चे पर उतारते हुए खुद को तनाव रहित करने का यह तरीका बड़ा सरल मालूम होता है.

बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक और माता-पिता भी मिलते हैं जो इस बात से बड़े दुखी होते हैं कि उनकी तो खूब पिटाई की गई थी लेकिन आजकल बच्चों के साथ इतनी नरमी से पेश आने का चलन हो गया है कि बच्चे इसके चलते ही बिगड़ रहे हैं. थोड़ी सजगता से देखने पर हम पाते हैं कि यह ऐसे लोग हैं जिन्हें 'दूसरे के दुख 'में आनंद आता है. खुद इनको इतना अधिक पीटा गया था कि बच्चों को सामान्य परिस्थितियों में पलते बढ़ते देखकर उनको लगता है कि कुछ गड़बड़ है. ऐसे लोगों को ही दूसरे के दुख में सुख लेने वाला कहा जाता है.

हमें अपने बच्चों को कोमलता से पालने पर ध्यान देना चाहिए. मनुष्यता, संवेदनशीलता और मासूमियत. इन तीन गुणों की कमी के कारण ही हमारे समाज में तेजी से वृद्ध आश्रम और अनाथालय बढ़ रहे हैं. हम बच्चे के साथ जितनी अधिक क्रूरता से पेश आएंगे बड़ा होकर वह भी उतनी ही क्रूरता से हमसे पेश आएगा.


आपको लग रहा है आप उस के भले के लिए कर रहे हैं, लेकिन ऐसा करते हैं आप भूल रहे हैं कि किया तो गलत ही जा रहा है. केवल नीयत से फर्क नहीं पड़ता, आप अपने मनचाहे काम के लिए बच्चे को उपकरण की तरह इस्तेमाल करेंगे तो बड़ा होकर वह भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेगा.

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बच्चे के साथ बिगड़ते सामाजिक रिश्ते के पीछे स्कूल/कॉलेज के परिणाम का सीधा रिश्ता है. हम बच्चे के छोटे से प्रदर्शन के पीछे इस तरह पड़ गए हैं कि पूरे जीवन की संरचना ही उलट गई है. इसलिए हमें समय रहते खुद को संभालने की जरूरत है. जिन बच्चों के परिणाम हमारे हिसाब से 'अच्छे' नहीं हैं, उनके प्रति संवेदनशील होकर ही उस सुखद भविष्य की कामना कर सकते हैं जो हमारी आंखों में तैरता रहता है. जीवन का सुख केवल हर चीज़ को हासिल करने में नहीं है. हमें उस जीवन दृष्टि की जरूरत है जो हमें आज से अधिक भविष्य की ओर कोमलता से देखने में मदद कर सकें. शुभकामना सहित...

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