#जीवनसंवाद: कल की कहानी!

जीवन संवाद

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#JeevanSamvad: अपने जीवन में 'अभी'‌ का प्रयोग शुरू कीजिए. आप पाएंगे कि बहुत से प्रश्न अपने आप नष्ट हो गए. अनेक संकट उड़ गए. भीतर शांति हुई, जीवन की आस्था, ऊर्जा लहलहाने लगी.

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जीवन संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर में लाओत्से का सुंदर उत्तर है, अभी. लाओत्से केवल इसी क्षण में सबकुछ घटित होने को देखते हैं. किसी भी प्रश्न के उत्तर को आज तो दूर, कल तक भी नहीं ले जाते. इतना अनिश्चित जीवन है हमारा. हम इस अनिश्चितता को छोड़कर कल के रंग में रंगे रहते हैं. दुख और अवसाद को ध्यान से देखने पर पाएंगे कि संकट की जड़ वह दृष्टि है जो आज के मुकाबले कल पर बहुत अधिक ध्यान देने को कहती है. आज प्रसन्नता का अवसर है, लेकिन हम कल खुश होंगे. यह तो कुछ ऐसा है जैसे बारिश आज हो रही है, लेकिन हम कल भींगने की योजना बनाएं. संभव है कि कल बारिश हो जाए, लेकिन उसका कोई भरोसा नहीं. यह जो पल हमारे पास है उसके अतिरिक्त किसी भी चीज का भरोसा नहीं.


हमारे एक मित्र हमेशा यही सवाल करते रहते हैं कि आगे क्या होगा. जब मन तनाव और बहुत अधिक चिंता में होता है, तो उसमें ऐसे प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं, लेकिन चिड़िया को तो आसमान में उड़ते हुए इस पल ही अपनी रक्षा करनी होती है. कल तो तभी तय होगा जब वह इस पल बाज से बच पाएगी. आज सुरक्षित घर पहुंच जाना भी जीवन की दिशा में एक बड़ा काम है. इस पल सुरक्षित होने का अर्थ है कि हम संभव है अगले पल भी सुरक्षित रह पाएं. अपने जीवन में 'अभी' का प्रयोग शुरू कीजिए. आप पाएंगे कि बहुत से प्रश्न अपनेआप नष्ट हो गए. अनेक संकट उड़ गए. भीतर शांति हुई, जीवन की आस्था, ऊर्जा लहलहाने लगी.

साहिर लुधियानवी के एक गीत की पंक्तियां हैं-

'मौत कभी भी मिल सकती है लेकिन जीवन कल न मिलेगा. मरने वाले सोच समझ ले फिर तुझको यह पल न मिलेगा.'


सोने की चिड़िया (1958) के लिए लिखा गया यह गीत मानो इसी पल की पैरवी कर रहा है. इस पल में ही सबकुछ है. जो बीत गया वह भी अब हमारी पकड़ से बाहर है और जो आने वाला है उसके बारे में तो कुछ कहना ही संभव नहीं. इसलिए, इस पल को जीना बहुत जरूरी है. इसी क्षण हंसना/रोना/ आनंदित होना सबकुछ करना जरूरी है. अगर कल के लिए कुछ रखना है, तो केवल आशा रखें. आशा उद्देश्य की नहीं, प्रेम और जीवन की होनी चाहिए. इसी गीत में साहिर ने आगे लिखा है-

'रात भर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा.'


कोरोना के बीच जीवन की अर्थव्यवस्था को देखिए. थोड़ी सजगता से देखने पर पाएंगे कि यह अर्थ की नहीं, मन की व्यवस्था है. मन की व्यवस्था भी अर्थव्यवस्था जितनी ही जरूरी है. यह जो कर्जे का जीवन हम जी रहे हैं. कर्ज लेकर खुद को सुखी करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे जीवन में कम से कम सुख का आना, तो बहुत मुश्किल है. कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर दुख अत्यधिक तरक्की से जुड़ी आशा के हैं.

हमें ध्यान देना होगा कि अत्यधिक आशा का परिणाम निराशा के अलावा कुछ नहीं है. जितनी ज्यादा आशा होगी, निराशा उससे दोगुनी होगी. इसलिए, अपने जीवन मूल्य को टटोलना सबसे अधिक जरूरी है. मेरे ख्याल में, हमारा होना और न होना सबसे बड़ा प्रश्न होना चाहिए. बाकी दूसरी चीजें तो आती-जाती रहेंगी. लेकिन इस कोरोना में सबसे अधिक संकट जीवन पर ही गहरा रहा है. जीवन भी कैसा! जो इतनी अधिक आशा में लिपट गया था कि उसने कभी सोचा ही नहीं कि निराशा भी हो सकती है.

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कभी कर्ज के प्रति सतर्क रहने वाला समाज अचानक कर्ज को गर्व की दृष्टि से देखने लगा. बाजार के बारे में पता होना ठीक है, लेकिन हमेशा खरीदार बने रहना, जीवन के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता. इससे हमारी पूरी जीवनदृष्टि अपनी दिशा खो बैठी है. हम कल की आशा में इतने अधिक आगे निकल गए कि अब लौटना मुश्किल हो रहा है. इसलिए, जीवन संवाद का निवेदन है कि आज की ओर लौटिए. अभी की ओर लौटिए. जीवन का सारा निचोड़, अभी में है. लाओत्से की सुनिए. उसमें हमें अनेक दुखों से उबारने की शक्ति है!

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