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#जीवनसंवाद: तनाव और विराट कोहली!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 15, 2019, 2:03 PM IST
#जीवनसंवाद: तनाव और विराट कोहली!
#जीवनसंवाद: तनाव और विराट कोहली!

Jeevan Samvad: विराट पांच साल पहले का दर्द आज बता रहे हैं. इससे तनाव, डिप्रेशन को लेकर हमारे डर को आसानी से समझा जा सकता है. हम जब आत्‍मीयता, स्‍नेह, विश्‍वास की डोर से नहीं जुड़ेंगे, मन की गांठ नहीं खुलेगी.

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  • Last Updated: November 15, 2019, 2:03 PM IST
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भारतीय क्रिकेट टीम का कप्‍तान होने से बड़ा चुनौतीपूर्ण काम भारत में शायद ही दूसरा हो. एक ऐसा काम जिसमें करोड़ों सलाहकार हैं. हर कोई विशेषज्ञ है. सलाह दे रहा है. सोशल मीडिया पर आपको आसानी से ट्रोल किया जा सकता है. आपकी टीम कभी हार नहीं सकती. जीतने पर भी इसे क्‍यों खिलाया, उसे क्‍यों खिलाया की बहस बंद नहीं होती. आपके परिवार को भी नहीं बख्‍शा जाता.

अनुष्‍का शर्मा का नाम भारतीय टीम के हारने पर जिस तरह लिया जाता है, वह बहुत ही परेशान करने वाला होता है. आम आदमी को छोड़िए, फारूख इंजीनियर जैसे क्रिकेट के जानकार भी अनुष्‍का को विवाद में शामिल करने से संकोच नहीं करते. बाहर से देखने में क्रिकेट जितना आसान लगता है, भीतर से उतना ही जटिल, मुश्किल है. इसमें उतने ही संकट हैं, जितने हम सबकी नौकरी, जिंदगी में हैं.

अगर ऐसा न होता तो विराट को यह नहीं कहना पड़ता, ‘2014 में मुझे लगता था कि दुनिया खत्‍म हो गई. क्‍या करूं, किससे बात करूं. कुछ समझ में नहीं आता था. मानसिक तनाव में ब्रेक लेना बिल्‍कुल सही है. उस समय मैं यह कहने की दशा में नहीं था कि मानसिक रूप से बहुत अच्‍छा नहीं महसूस कर रहा हूं, मुझे खेल से दूर रहने की जरूरत है.’

विराट यह सब ऐसे समय में कह रहे हैं, जब हमारी तुलना में सहज समझे जाने वाले ऑस्‍ट्रेलियाई खेल समाज से तनाव को लेकर चिंतित करने वाली खबरें आ रही हैं. आक्रामक बल्‍लेबाज ग्‍लेन मैक्‍सवेल ने तनाव के कारण क्रिकेट से दूर रहने का फैसला किया है. इसके कुछ ही दिन बाद बल्‍लेबाज निक मेडिसन और पिछले दिनों ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर विल पुकोवस्की ने भी तनाव के कारण कुछ समय के लिए खेल से दूर जाने की बात कही है. इससे बहुत पहले अपनी आक्रामक शैली, तकनीक के कारण इंग्‍लैंड के बल्‍लेबाज मार्कस ट्रेस्‍कोथि‍क भी तनाव के कारण संन्‍यास ले चुके थे. कुछ समय पहले इंग्‍लैंड की महिला क्रिकेट टीम की प्रमुख सदस्‍य साराह टेलर ले भी तनाव के कारण संन्‍यास लिया.

आप सवाल कर सकते हैं कि इसमें भारतीय क्रिकेटर के नाम नहीं हैं. इसका कारण उनका तनाव से दूर होना नहीं, बल्कि असुरक्षा, साहस की कमी है. विराट पांच साल पहले का दर्द आज बता रहे हैं. इससे तनाव, डिप्रेशन को लेकर हमारे डर को आसानी से समझा जा सकता है. हम जब आत्‍मीयता, स्‍नेह, विश्‍वास की डोर से नहीं जुड़ेंगे, मन की गांठ नहीं खुलेगी.


भारतीय समाज तनाव को सरलता से स्‍वीकारने के लिए तैयार नहीं रहता. इसलिए भीतर तो घुटते रहे, लेकिन बाहर कुछ नहीं कह रहे थे. बहुत संभव था कि कोहली ने अगर उस समय ऐसा कुछ कहा होता तो वह टीम से बाहर हो जाते. उनका यह डर उस समय तक था, जब तक वह पर्याप्‍त क्रिकेट खेल चुके थे, लेकिन अपनी जगह को लेकर इस समय की तरह चिंता मुक्त नहीं थे.

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एक देश के रूप में हम अभी भी तनाव से गुजरने वाले को ‘पागल’ कहने से संकोच नहीं करते. उससे नजर मिलते ही कन्‍नी काटने लगते हैं. अगर कोई हमसे कहे कि तुम कुछ ठीक नहीं लग रहे तो तुरंत खंडन में जुट जाते हैं.

ग्‍लेन मैक्‍सवेल ने जिस तरह सबके सामने आकर तनाव को स्‍वीकार किया, यह हमारे लिए एक अच्‍छी सीख है. विराट बच्‍चों, युवाओं में लोकप्रिय हैं, इसलिए उन्‍होंने देर से ही सही सबके सामने आकर जिस तरह दिलेरी से तनाव को साझा किया. वह बेमिसाल है. अगर आप परेशानी में हैं. अच्‍छा महसूस नहीं कर रहे. आलोचना को नहीं सह पा रहे हैं तो आपको मनोचिकित्‍सक के पास जाना ही चाहिए. इसके पहले कि आप तनाव के भंवर में फंसें, सलाह लेने में संकोच मत कीजिए.

तनाव से जूझ रहे व्‍यक्ति के लिए अपने काम से कुछ समय के लिए दूरी बहुत अच्‍छा सुझाव होता है. इससे उसे खुद को संभालने, समझने के लिए समय मिल जाता है. लेकिन ज्‍यादातर कंपनियों में इस तरह के बुनियादी इंतजाम नहीं हैं.

हम मानसिक रूप से परेशानी झेल रहे लोगों को यह समझाने में असफल रहे हैं कि यह एक ऐसी स्थिति है, जो किसी के जीवन में भी आ सकती है. इसलिए, इसे स्‍वीकार करने में शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए. मानसिक परेशानी को पागलपन से जोड़ना कुछ ऐसा ही है, जैसे सर्दी को मलेरिया कह देना.


मन अलग-अलग चीज़ों से जुड़ा होता है, इसलिए उस पर अनेक ऐसी चीजों का असर पड़ना स्‍वाभाविक है, जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं. ऐसे में जब भी किसी की ओर से आपको ऐसे संकेत मिलें, जो उसके असहज व्‍यवहार को बताते हों तो उसके प्रति सजग हो जाइए. उससे अपनी ओर से अधिक आत्‍मीयता, स्‍नेह बढ़ाने का प्रयास करें, जिनसे मन की गांठ खुल सके. भीतर का दर्द आसानी से बाहर आ सके. मन ऐसे ही निर्मल होता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 15, 2019, 11:47 AM IST
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