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#जीवन संवाद: बच्चों को क्या बनाना है!

#जीवन संवाद: बच्चों को क्या बनाना है!

इस समय हर कोई बहुत जल्दी में है, यह बात और है कि कोई कहीं पहुंचता दिखाई नहीं देता. अक्सर पहुंचकर भी रास्ते में ही रहते हैं!

इस समय हर कोई बहुत जल्दी में है, यह बात और है कि कोई कहीं पहुंचता दिखाई नहीं देता. अक्सर पहुंचकर भी रास्ते में ही रहते हैं!

इस समय हर कोई बहुत जल्दी में है, यह बात और है कि कोई कहीं पहुंचता दिखाई नहीं देता. अक्सर पहुंचकर भी रास्ते में ही रहते हैं!

    बच्चों के लिए माता-पिता का आशावादचिंता नई चीज नहीं है. यह हमेशा से थी. हांपहले यह बहुत हद तक 'समयसे आकार लेती थी. अब यह चिंता बच्चे की शिक्षा आरंभ होते ही तनाव में बदल जाती है. 'डियर जिंदगीको बड़ी संख्या में अभिभावकों के सवाल मिल रहे हैं.
    परीक्षा के कठिन मौसम में बच्चों से कहीं अधिक तनाव में अभिभावक रहते हैं. इस समय इंटरनेट पर दस साल का बच्चा एलेक्स छाया हुआ है. एलेक्स खुद को 'ओशियानिया एक्सप्रेसका संस्थापक और सीईओ कहता है. एलेक्स ने ऑस्ट्रेलियन एयरलाइंस 'क्वांटसके सीईओ एलन जोएस को चिट्ठी लिखकर अपनी एयरलाइंस खोलने के लिए मदद करने की गुजारिश की है. बच्चे ने लिखा, 'प्लीजमुझे सीरियसली लेंमैं एक एयरलाइंस शुरू करना चाहता हूं .'एलन ने चिट्ठी का जवाब देने के साथ ही उन्हें मिलने के लिए भी बुलाया है.



    यहां चिट्ठी के जिक्र का अर्थ केवल इतना है कि दुनिया के दूसरे समाजों में बच्चों को किस तरह लिया जाता है. बच्चे की चिट्ठी को एक सीईओ कितनी गंभीरता से ले रहा हैउसे संवाद का मौका दिया जा रहा है और उसे जितना संभव हो प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसके उलट हमारे यहां माता-पिता केजी वन से लेकर पहली दूसरी में ही बच्चे के स्कूल में प्रदर्शन से दुखी हुए जा रहे हैं. हम अपने बच्चे को एक ऐसे 'तुलना घरमें धकेले जा रहे हैं जहां हर समय उसे परीक्षा से गुजरना है. बच्चे की रुचिउसकी प्रतिभा के दायरे तलाशने की जगह हम पहले से चुनीतय की हुई चीजें उसके ऊपर थोप रहे हैं.

    हम बच्चे को ऐसे 'दीवारकी ओर धकेल रहे हैं जहां कोई खिड़की नहीं है जहां कोई रोशनदान नहींबस गहरा अंधेरा है. अब यह केवल संयोग की बात हो सकती है कि उसके धक्के से या तो दीवार में सुराग हो जाए या किसी वजह से कोई हाथ बढ़ाकर उसे दीवार के उस पार ले जाए. हम बच्चों पर अपने और अपने समय के वह सभी ग्लैमरस सपने थोप रहे हैं जिनसे उनके 'कुछ हो जानेकी आस है.


    हमारे एक मित्र हैं जो किसी जमाने में गायक बनना चाहते थेनहीं बन पाए तो आप अपने 15 बरस के बेटे में अपना सपना जीने की कोशिश कर रहे हैं. बच्चे की आवाज निसंदेह अच्छी हैलेकिन वह तो कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहता है. अमेरिका जाकर पढ़ना चाहता है और भारत के लिए सुपर कंप्यूटर से बहुत आगे की कोई चीज तैयार करना चाहता है. वह अपने सपने को जीना चाहता हैमित्र बेटे के बहाने 'अपनेसपने को पूरा करना चाहते हैं. यह सपनों का टकराव नहींसपने का अतिक्रमण है.

    अब ज़रा एलेक्स के सपने और इस बच्चे के सपने को सामने रखकर देखिए. एलेक्स के सपने को एक अनजान सीईओ का सहारा मिलता है. दूसरी ओर हमारे यहां एक पिता अपने सपने के लालच को संभाल नहीं पा रहा. बच्चे में उसके खुद के स्वतंत्र सपने को पूरा करने की हिम्मत कैसे भरेगा.

    हमें बहुत गंभीरता से एक समाज के रूप में यह समझने की जरूरत है कि हम अपने बच्चों को कितनी स्वतंत्रता दे रहे हैं और कितनी देने की जरूरत है. बच्चों को महंगे स्कूलमहंगी ज़िदकपड़े और गैजेट की जगह अगर किसी चीज़ की सबसे ज्यादा जरूरत है तो 'उनकेसपनों की तलाश में मददगार बनने की. उनके भीतर की प्रतिभा को बिना किसी मिलावट के जानने और समझने की. बच्चों पर दांव लगाने की और उनके सपनों में साझेदार होने की. इससे हम बहुत हद तक उनके भीतर बढ़ रहे तनावगहरी निराशा और आत्महत्या जैसे खतरे को कम कर सकते हैं.

    पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
    Network18
    एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
    सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
    ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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    Tags: Dayashankar mishra, Dear Zindagi, Effect on your life, JEEVAN SAMVAD, Lifestyle, Motivational Story

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