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#जीवनसंवाद: मन के भंवर!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 1, 2019, 11:21 AM IST
#जीवनसंवाद: मन के भंवर!
जीवनसंवाद

Jeevan Samvad: मन की कहानी से ही जीवन का सिनेमा रचा जाता है. जिंदगी की यही रीत है. मन को कोमल, स्नेहिल, आत्मीय बनाए रखने से हमारी नाव भंवर से बची रहेगी.

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  • Last Updated: November 1, 2019, 11:21 AM IST
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मन के सोच-विचार को समझने के लिए मुझे टाइटैनिक फिल्म के 'बर्फ के पहाड़' से बेहतर उदाहरण नहीं मिलता. समंदर में बर्फ के पहाड़ जिस तरह टीले के रूप में नजर आते हुए जहाज के कप्तानों को भ्रमित करते रहते है. हमारा मन कुछ ऐसे ही हमें उलझाता रहता है. 'डियर जिंदगी : जीवन संवाद' के लगभग तीन बरस के सफर में आपकी ओर से मिल रही प्रतिक्रिया, संवाद भी कुछ ऐसी ही समझ बनाते हैं. हम अपने मन से बहुत अपरिचित हैं. इतना अधिक कि उसका बहाव ऐसे तट पर ले जाकर खड़ा कर देता है, जो जीवन के लिए खतरनाक साबित होते हैं.

जयपुर से राधिका तिवाड़ी लिखती हैं, 'मन हसरत के पहाड़ खड़े करता है. इससे पार पाना लगभग असंभव है. यह जिंदगी को कबाड़ बना देता है.' राधिका जी की बात सही है. लेकिन मैं उनकी पार न पाने वाली बात से सहमत नहीं. मुझे लगता है कि मन को भी वैसे ही प्रशिक्षित किया जा सकता है, जैसे शरीर को.

शरीर और मन के प्रशिक्षण में बहुत अंतर नहीं है. हां, बस इतना जरूर है कि मन के बारे में हम बहुत अधिक भ्रमित हैं. हमें इतनी अधिक चीजें इसके बारे में बताई जाती हैं कि हम खुद ही नहीं समझ पाते हैं कि यह हमारा ही मन है. जबकि असल में हम कुछ और नहीं केवल अपना मन हैं. हम अपने मन के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं.


हमारा मन बहुत छोटे-छोटे फैसलों से बनता है. पहले हम मन को बनाते हैं, उसके बाद वह जिंदगी भर हमें चलाता है. हम सब कुछ वही हैं जो हमारा मन है. इसलिए मन को सेहतमंद, सुंदर बनाए रखना जरूरी है. हम भारतीय अक्सर आत्मा के बारे में बात करते रहते हैं. उसे स्वस्थ और सत्य बताते हुए शरीर और मन की अनदेखी करते जाते हैं. विशेषकर मन की.


जीवन के बड़े फैसले, कौन करता है. कोई काम करना है नहीं करना है, यह कौन तय करता है? इसके उत्तर में आप बहुत सारे लोगों के नाम, सलाह गिना सकते हैं, लेकिन असल में इन सबका सूत्रधार मन ही है. मन जितनी तेज गति से चलता है, उससे कहीं अधिक गति से हमें गढ़ता है. मन के नहीं मानने के कारण हमारे छोटे-छोटे काम रुके रहते हैं. उसके एक झटके में मानते ही पहाड़ जैसे काम भी सहज ही हो जाते हैं.

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हमारे मित्र का तलाक हो गया. उनके दुखी होने का यह पर्याप्त कारण था. लेकिन कब तक? संयोग से इस स्थिति से एक ही वक्त में दो लोगों को गुजरना पड़ा. दोनों के साथ ही बच्चे नहीं थे. परिवार का दबाव भी नहीं था. लेकिन एक चीज़ थी जो दोनों को अलग करती थी. एक के पास आर्थिक संकट नहीं था, दूसरे के पास इसके अलावा कोई संकट नहीं था.

जिसके पास धन था, दुख की गठरी से चिपका रहा. जिसके पास नहीं था, उसने अपने आप को कामकाज में डुबो दिया. तीन बरस बाद स्वयं को काम में डुबाने वाला व्यक्ति कहीं अधिक प्रसन्न है, उसके मुकाबले, जिनके पास साधन अधिक थे.


जीवन में कई बार विकल्प का होना भी हमें मुश्किल में डाल देता है. जिसके पास कई ठिकाने होते हैं, उनका मन भंवर में अधिक धंसता हुआ दिखता है. जिसके पास रास्ते नहीं होते, वह मंजिल की खोज में कहीं अधिक सक्रिय, सजग रहता है. मन की कहानी से ही जीवन का सिनेमा रचा जाता है. जिंदगी की यही रीत है. मन को कोमल, स्नेहिल, आत्मीय बनाए रखने से हमारी नाव भंवर से बची रहेगी.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 31, 2019, 12:16 PM IST
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