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#जीवनसंवाद : जिंदगी की धूप और हम!

News18Hindi
Updated: September 26, 2019, 5:56 PM IST
#जीवनसंवाद : जिंदगी की धूप और हम!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमें यह भी सोचना चाहिए कि दस साल में ऐसा क्या हो गया कि हम दुख का सामना अकेले-अकेले करने लगे. आप सुख अकेले उठाएंगे तो दुख के समय कितने लोग साथ आएंगे, यह समझना मुश्किल नहीं.

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  • Last Updated: September 26, 2019, 5:56 PM IST
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बहुत पुरानी बात नहीं है. हमारे पास चीजें कम थी, लेकिन जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कहीं अधिक आशा, विश्वास, प्रेम और स्नेह से भरा हुआ था. हम मुश्किल का सामना कहीं अधिक विश्वसनीय तरीके से कर रहे थे. ‌एक-दूसरे के साथ में हमारा विश्वास गहरा था. एक-दूसरे की मदद करने की हमारी सीमाएं हैं. हर किसी को अपने हिस्से के कष्ट का सामना स्वयं ही करना होता है. इसके बाद भी हमें एक-दूसरे से जोड़ने वाली सबसे बड़ी कड़ी एक-दूसरे के साथ खड़े होना है. उस वक्त जब हर कोई आपको यह बताने में लगा होगा कि आपने जीवन में कितनी बड़ी गलतियां की हैं. दिए गए सुझावों को अनदेखा किया है. उस समय जो सामने आकर आपके लिए स्नेह का छाता खोल दे, उससे बड़ा व्यक्ति आपके लिए जीवन में कोई दूसरा नहीं हो सकता.

जिंदगी की 'धूप' बढ़ती- घटती रहती है. इस पर हमारा नियंत्रण बहुत कम है. हां, हम अपने हिस्से के स्नेह, आत्मीयता से इस धूप का असर अपनों के जीवन से कम कर सकते हैं.



छोटा-सा किस्सा सुनते चलिए. भारत में पिछली बार जब मंदी के बादल छाए थे. उस समय जयपुर में रहने वाले संयुक्त परिवार के चार में से तीन भाइयों की नौकरी चली गई. उन्होंने बचत और एक भाई के सहारे इस मुश्किल का सामना सरलता से कर लिया. दो साल बाद सब कुछ ठीक हो गया. सब अपने-अपने काम में जुट गए.


आज इस कहानी के लगभग दस साल बाद एक बार फिर अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल मंडरा रहे हैं. परिवार के युवा बच्चों में से चार की नौकरी चली गई. लेकिन उनके बीच मुश्किल वक्त में वैसी साझेदारी, हिस्सेदारी नहीं दिख रही है. सब अपने-अपने तरीके से मुश्किल वक्त की धूप का सामना कर रहे हैं. इस तरह सब परेशान हैं.

क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन कुछ वक्त आपकी मदद कर सकते हैं, लेकिन इनकी भी सीमाएं हैं. यह आपको कर्ज के चक्रव्यूह की ओर धकेलते हैं. यह हमारा अहंकार, झिझक, ओढ़ा हुआ संकोच है, जो अपनों के पास जाने से रोकता है, लेकिन बाजार से उधार लेने में इसे संकोच नहीं होता. यह हमारी अकेले होते जाने की छोटी सी झलक है.


हमें यह भी सोचना चाहिए कि दस साल में ऐसा क्या हो गया कि हम दुख का सामना अकेले-अकेले करने लगे. आप सुख अकेले उठाएंगे तो दुख के समय कितने लोग साथ आएंगे, यह समझना मुश्किल नहीं. जब तक हम दूसरों के लिए धूप में छांव का इंतजाम नहीं करेंगे, हमारे लिए यह कौन करेगा इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है.
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: September 26, 2019, 8:54 AM IST
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