लाइव टीवी

#जीवनसंवाद: कितनी ज़रूरत!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 27, 2019, 4:47 PM IST
#जीवनसंवाद: कितनी ज़रूरत!
हम इच्छा की एक गली से गुजरते ही दूसरी की ओर मुड़ जाते हैं. हसरत थमती नहीं, धड़कन जरूर गिरवी होती जाती है. इच्छा का प्रबंधन जीवनशैली का सबसे जरूरी हिस्सा है.

Jeevan Samvad: अपनी जरूरतों पर नियंत्रण किए बिना किसी व्यक्ति का अहिंसक होना सरल नहीं. जरूरत से अधिक संग्रह की शैली हमें किसी न किसी रूप में हिंसा की ओर ले ही जाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2019, 4:47 PM IST
  • Share this:
हमारी कितनी चाहतें हैं! इस बात का पता लगाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है. हम इच्छा की एक गली से गुजरते ही दूसरी की ओर मुड़ जाते हैं. हसरत थमती नहीं, धड़कन जरूर गिरवी होती जाती है. इच्छा का प्रबंधन हमारी जीवन शैली का सबसे जरूरी हिस्सा है. इसकी अनदेखी केे कारण ही हम जीवन को तनाव, गुस्से, कड़वाहट और हिंसा से भरते जा रहे हैं.

हम गांधी की 150वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं. अहिंसा, केवल हिंसा का प्रतिउत्तर नहीं है. वह गहरी, भीतरी अंतर्दृष्टि है. किसी सैनिक का जीवन अहिंसा का उदाहरण हो सकता है तो दूसरी ओर किसी साधु कहे जाने वाले व्यक्ति का जीवन भी अहिंसा हासिल करने की चाहत में ही बीत जाता है. अहिंसा, कठिनाई से हासिल होने वाली चेतना है, इसके लिए जीवन को बहुत कठिन अभ्यास से गुजरना होता है.

अपनी जरूरतों पर नियंत्रण किए बिना किसी व्यक्ति का अहिंसक होना सरल नहीं. जरूरत से अधिक संग्रह की शैली हमें किसी न किसी रूप में हिंसा की ओर ले ही जाती है. अहिंसा केवल शारीरिक गतिविधि नहीं है. हम अपने मन में दूसरों के प्रति कैसी धारणा रखते हैं, किसी विचार को हम कैसे ग्रहण करते हैं. हमारा चिंतन, मनन, विचार और चेतना मिलकर हमें अहिंसक/हिंसक बनाते हैं.



जीवन में कुछ देर से ही सही, लेकिन अब जाकर मैं खुद को अहिंसा की ओर जाता हुआ महसूस कर रहा हूं. भारत में गांधी को जानने, समझने का बड़ी संख्या में दावा करने वाले लोगों के बीच भी मुझे कहने में संकोच नहीं कि हम अहिंसा से वंचित समाज हैं. हमारे बीच अहिंसा का विस्तार देने वाले पुल आए दिन टूट रहे हैं. हम जीवन से जैसे-जैसे कटते जाएंगे, अहिंसा से दूर निकलते हुए हिंसा के निकट पहुंचते जाएंगे.

पहले हमारे पास धन नहीं था. उसके बाद भी बड़ी संख्या में हम एक ही घर में रहते थे. उसके बाद हमारी जरूरतों ने विस्तार लिया. हम बड़े-बड़े विशाल घरों में रहने लगे लेकिन अकेले-अकेले! ऐसा करते हुए जिस चीज से सबसे अधिक दूर हुए, वह एक दूसरे का साथ थी. व्यक्ति जैसे-जैसे अकेला होता जाता है, वह स्वयं से घिरता चला जाता है. आत्ममुग्धता भी एक किस्म की हिंसा है. यह हमें दूसरे को कुछ भी मानने से रोकती है. 'मैं ही सब कुछ हूं' यह विचार लिए हुए हम अहिंसक नहीं हो सकते. इस समय वह लोग जो स्वयं को आधुनिक, दुनिया से जुड़ा हुआ कहते हैं, वह कहीं ना कहीं इस मनोविकार से जूझ रहे हैं.

कुछ समय पहले मेरे पास एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले युवा आए. उन्होंने कहा, 'जीवन में शांति नहीं है.' उनकी बात विस्तार से सुनने के बाद मैंने कहा, 'जड़ों की ओर लौटिए.' उन्हें सुझाव दिया, 'अपने भाई, माता-पिता के साथ थोड़ा समय बताइए. जो आपकी फिक्र करते हैं. लेकिन आपके पास उनके लिए समय नहीं है. समय किसी के पास नहीं है!'
Loading...

बात केवल इतनी है, हम अपनी जरूरत के लिए कितनी कुर्बानी दे सकते हैं. इच्छाएं कभी थमने का नाम नहीं लेतीं, लेकिन अगर आप जीवन का आनंद लेना चाहते हैं तो आपको इस दिशा में गंभीरता से सोचना ही होगा. इससे आपको अहिंसा की ओर आगे बढ़ने में कुछ मदद मिलेगी!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें: #जीवनसंवाद : एक दूसरे को सुनना!

#जीवनसंवाद: अकेले हम अकेले तुम!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 27, 2019, 9:04 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...