#जीवनसंवाद : समझना!

हमारे दिमाग-मन में दूसरे के 'दृष्टिकोण' के लिए जितनी सहनशीलता होगी, हम उसे उतना ही बेहतर समझ पाएंगे!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:12 AM IST
#जीवनसंवाद : समझना!
लखनऊ से 'जीवनसंवाद' के पाठक विनम्र भारद्वाज लिखते हैं कि एक दिन उनका पत्नी से झगड़ा केवल इस बात के लिए कई दिन के 'अबोले' में बदल गया.
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:12 AM IST
हम एक-दूसरे से सबसे अधिक शिकायत 'समझने' को लेकर ही करते हैं. परिवार, दंपति के बीच होने वाले मनभेद का बड़ा कारण इस समझ की कमी ही है. सबसे अधिक शिकायत बात 'ठीक' से नहीं समझने की है.

एक-दूसरे को समझना इतना मुश्किल इसलिए होता गया, क्योंकि हम एक-दूसरे के लिए दिल में जगह कम करते जा रहे हैं. हम कहते कुछ और, सुनते कुछ और, अब समझते तो बिल्कुल ही कुछ 'और' हैं. हम अक्सर वह नहीं समझते, जो हमें समझाने की कोशिश की जा रही होती है, बल्कि वह समझते हैं जो पहले ही समझ चुके होते हैं. इसे समझ का सही, ठोस होना नहीं कहा जाएगा. बल्कि इसे इस रूप में समझने की जरूरत है कि हम दूसरों के लिए कितने उदार, स्नेहिल हैं. हमारे दिमाग में दूसरे के 'दृष्टिकोण' के लिए जितनी सहनशीलता होगी, हम उसे उतना ही बेहतर समझ पाएंगे!

लखनऊ से 'जीवनसंवाद' के पाठक विनम्र भारद्वाज लिखते हैं कि एक दिन उनका पत्नी से झगड़ा केवल इस बात के लिए कई दिन के 'अबोले' में बदल गया, क्योंकि ऑफिस से घर पहुंचते ही वह किसी गंभीर समस्या के समाधान के लिए तुरंत बात करने की कोशिश करने लगीं. विनम्र ने कहा, 'मैं ऑफिस की किसी बात को लेकर पहले से ही तनाव में था. घर के सवालों के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था.'

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लखनऊ से 'जीवनसंवाद' के पाठक विनम्र भारद्वाज लिखते हैं कि एक दिन उनका पत्नी से झगड़ा केवल इस बात के लिए कई दिन के 'अबोले' में बदल गया.


विनम्र लिखते हैं, 'उन्हें 'जीवन संवाद' के एक लेख से मदद मिली. जिसमें एक-दूसरे को समझने के लिए कबीर के एक प्रसंग का उल्लेख किया गया था. आप भी उस किस्से से गुजरिए, संभव है, किसी दिन काम आए!

कबीर को जानने वाले एक व्यक्ति उनके घर गए और उनसे अपने घर में आए दिन होने वाली कलह के लिए समाधान सुझाने को कहा! कबीर कुछ देर मौन में रहे. उसके बाद उन्होंने पत्नी से कहा, कुछ मीठा ले आइए. थोड़ी देर में वह नमकीन रख गईं. कबीर ने मेहमान से कहा, लीजिए. कुछ देर बाद कबीर ने कहा, ज़रा लालटेन जला दीजिए. पत्नी लालटेन रखकर चुपचाप चली गईं. मेहमान को अजीब लग रहा था, लेकिन वह सोच रहे थे कि कैसे पूछें. कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा, कुछ समझ में आया. मेहमान ने कहा, नहीं.

कबीर ने कहा, जब उन्होंने मीठे के बदले नमकीन रखा, तो मैंने कुछ नहीं कहा. मैं समझ गया कि घर में मीठा नहीं होगा. इसी तरह जब मैंने दिन में लालटेन लाने को कहा, तो उन्होंने बजाए बहस, पूछताछ करने के इस बात को समझा कि कुछ ठोस कारण होगा.
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हमें जीवनसाथी, मित्रों, सहकर्मियों के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण रखना होगा. अगर कोई अप्रत्याशित व्यवहार कर रहा है, कुछ ऐसी बात कह रहा है जो उसके व्यवहार के अनुकूल नहीं है. तो हमें तुरंत गुस्से, कटुता और चीखने की ओर बढ़ने से उसको रोकना होगा! हमें उसे थोड़ा समय देना होगा. ऐसा करके हम दूसरे से खुद अपने मन, मस्तिष्क और शरीर को स्नेह, ऊर्जा और प्रेम से भरते हैं. समझना कितना आसान है, इसे केवल समझने की शुरुआत से समझा जा सकता है!

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First published: July 10, 2019, 6:54 PM IST
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