#जीवनसंवाद : पहले खुद को समझाना! 

इस समय जिस तेजी से डिप्रेशन बढ़ रहा है, उसके पीछे स्वयं को इतना बड़ा मान लेने की आदत है कि जीवन मेंं छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव को भी हम बड़ी मुसीबत मान लेते हैं.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:04 AM IST
#जीवनसंवाद : पहले खुद को समझाना! 
इस समय जिस तेजी से डिप्रेशन बढ़ रहा है, उसके पीछे स्वयं को इतना बड़ा मान लेने की आदत है कि जीवन मेंं छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव को भी हम बड़ी मुसीबत मान लेते हैं.
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:04 AM IST
अक्सर मौका मिलते ही हम दूसरों को कुछ समझाने लगते हैं. यह आदत तो लगभग सभी में मिलती है. किसी ने कुछ कम तो किसी में थोड़ी ज्यादा. ऐसे व्यक्ति से हम सब कभी मिले हैं जो ऐसी कोशिश नहीं करता, ऐसा कह पाना कम से कम मेरे लिए संभव नहीं. मौन का हमारे जीवन में जितना अधिक महत्व है, उतनी ही अधिक हम इसकी अनदेखी करते हैं.  मौन का अर्थ चुप रहना नहीं है. नाराजगी से मुंह फुला लेना भी नहीं. इसका अर्थ है जितनी जरूरत है, उससे भी दो शब्द कम.

'डियर ज़िंदगी' जीवन संवाद के पाठक डाक्टर सिद्धांत त्रिवेदी, कुछ समय पहले लखनऊ से दिल्ली आए. हमारा मिलना हुआ. संभवतः जीवन में पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति से मिल रहा था, जिसने इस मुलाकात में एक शब्द भी ऐसा नहीं कहा जिसकी जरूरत न हो.



सब कुछ सधा हुआ. वह कुछ भी समझाने जैसा करते ही नहीं. चिकित्सक होने के बाद भी ऐसा लगता है मानिए, उन्होंने जीवन में मौन को गहराई से उतार लिया है. यह कोई ओढ़ी हुई चीज नहीं है. यह गहरे अभ्यास, जीवनशैली से जीवन में उतरा हुआ तत्व है.

उनसे मुलाकात के बाद मेरी मान्यता और पुष्ट हुई कि हर किसी को समझाने के प्रति हमारे रवैये में कितने अधिक सुधार की गुंजाइश है. हम दूसरों को जो देने की कोशिश करते हैं, सबसे अधिक वही है, जो हमारा अनुभव है. हर किसी का अपना अनुभव है. हम सब अपने-अपने अनुभवों की चादर में लिपटे हुए लोग हैं. एक-दूसरे को 'समझाने' में जुटे हुए! स्वयं से बेखबर!



आइए, आज से छोटा सा अभ्यास करते हैं. किसी को कुछ मत समझाइए. पूछे गए प्रश्न का उत्तर दीजिए. शंका का यथासंभव निवारण कीजिए. लेकिन अपनी ओर से सुझावों को बंद कर दीजिए. यह बहुत मुश्किल लगता है, क्योंकि इसमें हमने अनेक तरह के उत्तरदायित्व से खुद को बांध लिया है. स्वयं को ऐसे अनेक छोटे-छोटे बंधन, अपेक्षा से मुक्त कीजिए, जो आपको सामान्य नहीं रहने देतीं.

हमें लगता है कि हमारे बिना इस धरती का गुजारा बहुत मुश्किल है. खुद को बहुत अधिक गंभीरता से लेने, विशिष्ट मानने के फेर में हम सामान्य जीवन से दूर होते जाते हैं. इस समय जिस तेजी से डिप्रेशन बढ़ रहा है, आत्महत्या बढ़ती जा रही है. उसके पीछे स्वयं को इतना बड़ा मान लेने की आदत है कि जीवन मेंं छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव को भी हम बड़ी मुसीबत मान लेते हैं. जबकि असलियत में इस पूरे ब्रह्मांड में हमारा अस्तित्व कितना है, इसके लिए ठीक-ठीक मिसाल मिलना भी मुश्किल है.
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इसलिए, जरूरी  है कि खुद को समझने, समझाने पर सबसे अधिक बल दिया जाए. जीवन बहुत छोटा है उसे बहुत सघनता से जीने की जरूरत है!

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पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

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