#जीवनसंवाद: अवकाश!

‘अवकाश’ स्नेह न मिलने से गुम हो गया है. अवकाश का अर्थ, फेसबुक पर नए मित्र तलाशना, उनकी खोज करना, हर बात पर अपनी प्रतिक्रिया देना नहीं है. बल्कि स्वयं के विश्राम, एकांत और संवाद से है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:12 AM IST
#जीवनसंवाद: अवकाश!
कुछ अच्छा पढ़े, लिखे, देखे और सुने बिना अगर दिन बीत रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप स्वयं को अवकाश नहीं दे रहे हैं.
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:12 AM IST
हम सबके पास हफ़्ते में कम से कम एक दिन की छुट्टी तो होती है. यह छुट्टी पहले कभी उतने 'खतरे' में नहीं थी, जितनी आज है. आज जबकि पहले की तुलना में हमारे अधिकांश काम घर बैठे हो रहे हैं. बैंकिंग, टिकट बुकिंग, सर्विस पेमेंट जैसी चीजें, जिनमें बहुत अधिक समय कतार में लग जाता था, अब लगभग एक इशारे पर हो जाता है. उसके बाद भी समय की जितनी अधिक शिकायत इस समय हो रही है पहले कभी हमने नहीं देखी. कुछ दिन पहले एक शादी में कुछ मजेदार अनुभव हुए.

बहुत से लोग बैठे, बात करने के लिए, क्योंकि बहुत दिन बाद मिल रहे थे. लेकिन थोड़ी ही देर में वह बातों से 'लाइक' की ओर चले गए. संवाद की जगह अपने-अपने स्मार्टफोन की ओर मुड़ गए. कुछ ऐसा भी हुआ है कि हम फोन पर बहुत बात करने लगे हैं. हमेशा बात करने लगे हैं. जैसे ही कोई अनुभूति, विचार, घटना, अनुभव से हम गुजरते हैं, तुरंत उस पर किसी न किसी से बात करने लग जाते हैं.

यह बात इन दिनों आवाज की तुलना में टेक्स्ट/लिखित रूप में कहीं अधिक होती है. इसका मतलब छोटी सी स्क्रीन पर हमारी आंखें, मन और हाथ एक साथ काम करते हैं. इसमें लैंडलाइन वाले फोन का सुकून तो दूर की कौड़ी है, मोबाइल पर बात करने का अनुभव भी पुराना होता जा रहा है. हर कोई, हर कहीं, हर किसी से 'चैटिंग' में व्यस्त है.

Dear Zindagi
कुछ अच्छा पढ़े, लिखे, देखे और सुने बिना अगर दिन बीत रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप स्वयं को अवकाश नहीं दे रहे हैं.


'अवकाश' हमारा स्नेह न मिल पाने के कारण कहीं गुम हो गया है! हमारे पास अपने लिए समय नहीं. अवकाश का अर्थ, फेसबुक पर नए मित्र तलाशना, उनकी खोज करना, हर बात पर अपनी प्रतिक्रिया देना नहीं है. बल्कि स्वयं के विश्राम, एकांत और संवाद से है.

कुछ अच्छा पढ़े, लिखे, देखे और सुने बिना अगर दिन बीत रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप स्वयं को अवकाश नहीं दे रहे हैं. अपनी ऊर्जा और अपने स्नेह को समय नहीं दे रहे हैं. संभव है आप अपने काम, मित्र, परिवार और सोशल मीडिया को खूब समय दे रहे हों, लेकिन जैसे आप तय समय पर गाड़ी की सर्विसिंग कराना नहीं भूलते, भूलने लगते हैं तो कंपनी और बाद में गाड़ी खुद आपको याद दिलाने लगती है वैसे ही आपका मन, मानसिक सेहत भी आपको संकेत करने लगते हैं. सबसे खराब स्थिति तब होती है, जहां आप इनके संकेतों को समझना तो दूर, स्वयं तक पहुंचने भी नहीं देते.

आप हर चीज को मैं कर सकता हूं, मुझे फर्क नहीं पड़ता, मैं बहुत मजबूत हूं, कहकर नहीं टाल सकते. दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों के साथ ही प्रदेश की विभिन्न राजधानियों से छपने वाले अखबार तक इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कैसे हम मानसिक रूप से हर दिन बीमार होते जा रहे हैं. हमारे आस-पास हर दिन तनाव बढ़ता जा रहा है. यह तनाव और डिप्रेशन एक दिन में हवा में नहीं आते, वह 'किसी' की जगह लेते हैं.
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यह घुटन हमारे आस-पास घट रहे प्रेम, एक-दूसरे के प्रति कम होती समझ और बढ़ती हिंसात्मक प्रवृत्तियों के कारण बेहद तेजी से बढ़ रही है. जैसे साफ हवा के लिए नए पौधे जरूरी हैं, शिक्षा के लिए स्कूल, सेहत के लिए अस्पताल वैसे ही मनुष्य के जीवन के लिए एक-दूसरे से संवाद, आस्था और कहे गए में भरोसा जरूरी है.

इसकी शुरुआत जरूरी नहीं कि बहुत से लोगों से की जाए, लेकिन कम से कम यह तो संभव है कि एक छोटे से समूह में हम बिना किसी संकोच के अपनी समस्या और अपने को सभी प्रश्न साझा कर सकें जिनके लिए हम अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं. संकोच तोड़िए अगर आपको अच्छा नहीं लग रहा है, आप उदास हैं आपका मन बेचैन है तो बात करिए. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप कैसी नौकरी में हैं, क्या काम करते हैं, किस पद पर हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. अवसाद, गहरी उदासी और गुस्सा किसी के मन में भी जगह बना सकते हैं. इनको समझने, इनका सामना करने लिए मन की प्रतिरोधक क्षमता बहुत जरूरी है. अवकाश, इस समझ का पहला पड़ाव है, उसका स्वागत कीजिए, उसे अपना स्नेह दीजिए!

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

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First published: July 10, 2019, 5:11 PM IST
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