#जीवनसंवाद: एहसानों का बोझ!

हम सबको यह समझने की जरूरत है कि जीवन में दूसरे की भूमिका कहां तक और कितनी होनी चाहिए. यहां ध्यान रहे कि 'आपके' अतिरिक्त यहां हर कोई दूसरा है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 26, 2019, 6:41 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 26, 2019, 6:41 PM IST
जीवन किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं होता. इसमें अलग-अलग स्तर पर विभिन्न व्यक्तियों का योगदान होता है. पौधे के पेड़ बनने की प्रक्रिया बहुत हद तक बच्चे के बड़े होने की कहानी है. रांची से अनामिका झा ने लिखा है कि वह अपने जीवन में निर्णय की आजादी से दूर चली गई हैं. उनकी परवरिश में पिता के साथ ही भाई, मामा और चाचा की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है कि अब जबकि वह बैंक में अपने लिए एक अच्छी भली नौकरी हासिल कर चुकी हैं उनके एहसान अब भी उन्हें अपना निर्णय लेने से रोकते हैं. पिता चाहते हैं अनामिका का विवाह उनकी पसंद से हो. धूमधाम से हो. जिसमें अनुमानित खर्च 10,00,000 रुपए है. जबकि भाई चाहते हैं कि वह शादी के बाद भी अपने पिता के घर में ही रहें, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में कोई परेशानी न आए. मामा और चाचा की भी इसी तरह की छोटी-छोटी अपेक्षाएं हैं जो स्नेह से अधिक आर्थिक हित, सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई हैं.

अनामिका 'डियर ज़िंदगी: जीवन संवाद' की नियमित पाठक हैं. उन्होंने लिखा है कि वह बहुत हद तक इस प्रश्न का उत्तर खोजने में जुटी हैं कि जिनके एहसानों से हम दबे हुए हैं उनको अपने जीवन में कितना दखल देने का अधिकार देना चाहिए. उसके बाद भी एक विचित्र किस्म का अपराधबोध उनके भीतर उमड़ता-घुमड़ता रहता है! सबसे पहले तो अनामिका को इस बात की बधाई कि उन्होंने इसे 'संकट' समझा. अन्यथा हम में से बहुत से लोग इससे जूझते तो रहते हैं, लेकिन इसे स्वीकार करने और इसके समाधान की ओर बढ़ते नहीं हैं.

Dear Zindagi
जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात है, मनुष्य के रूप में हमारा होना!


इस बारे में हम लगातार इस कॉलम में चर्चा करते रहे हैं, इसलिए मैं बहुत विस्तार में तो नहीं जाऊंगा, फिर भी उनके प्रश्न को समझाने की कोशिश करूंगा. आपको बात अटपटी लग सकती है, लेकिन मैं आपको इसके लिए महाभारत की यात्रा पर ले जाना चाहूंगा. इसकी एक वजह यह भी है कि मैंने आज ही शिवाजी सावंत के कर्ण पर आधारित मशहूर उपन्यास 'मृत्युंजय' को दूसरी बार पढ़कर खत्म किया है. कर्ण का पूरा जीवन क्या है! उसके बहुत से अर्थ हैं, लेकिन हमारे आज के संदर्भ में केवल इतना कि दूसरों के एहसान के बोझ तले रहते हुए हम एक सीमा के आगे नहीं जा सकते. कर्ण जैसा ओजस्वी, तपस्वी और अनोखा योद्धा अपने जीवन में बहुत सारा अपयश, अपमान सहते हुए केवल एहसान उतारने के लिए अन्याय में हिस्सेदार बनता है!

जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात है, मनुष्य के रूप में हमारा होना! हम हैं तो सबकुछ है, हम नहीं हैं तो कुछ भी नहीं! मैं आपको एहसान फरामोश होने के लिए नहीं कह रहा हूं. मैं आपसे केवल इतना कह रहा हूं कि जब भी कोई आप पर अनुचित दबाव डाले, ऐसा काम करने के लिए कहे, जो मनुष्य और मनुष्यता के सिद्धांतों के उलट है, तो तुरंत सारे लिहाज छोड़ दीजिए! लिहाज के साथ आपको लालच भी छोड़ने होंगे. कई बार हम लिहाज में लालच का मिश्रण करने के बाद 'न्याय' की तलाश में निकलते हैं. एक संपूर्ण और सुखी जीवन के लिए इस मिश्रण से बचना ही होगा.अनामिका के साथ ही हम सबको यह समझने की जरूरत है कि जीवन में दूसरे की भूमिका कहां तक और कितनी होनी चाहिए. यहां ध्यान रहे कि 'आपके' अतिरिक्त यहां हर कोई दूसरा है!

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)
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First published: July 10, 2019, 6:39 PM IST
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