#जीवनसंवाद : प्रेम संपत्ति नहीं है!

हम यात्री हैं. अनुभव के आधार पर राय बनाते हैं. अपने नजरिए से दुनिया को समझने का प्रयास करते हैं. समस्या तब होती है, जब हम देखने के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास के आधार पर फैसले करने लगते हैं!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 8:12 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 8:12 PM IST
प्रेम और संपत्ति लोकजीवन में इतने घुल-मिल गए हैं कि कभी-कभी यह पर्यायवाची जैसे लगते हैं. हम प्रेम को हृदय से जितना दूर ले जाते हैं, वह लोभ के उतने ही नजदीक पहुंच जाता है. प्रकृति और मनुष्य में मूल अंतर इसी बात का है. मेरा नीम का पेड़ मुझसे प्रेम तो करता है, लेकिन किसी तरह की अपेक्षा नहीं रखता. जबकि उसकी छांव में, हवा में इतनी शक्ति और प्रेम है कि वह आस-पास की सारी नकारात्मकता को अपने भीतर समा लेता है. आजीवन आपसे कुछ लेता नहीं, बस देने की चेष्टा में रहता है. प्रेम का यही तो सबसे बड़ा आधार है.

हम यात्री हैं. अनुभव के आधार पर राय बनाते हैं. अपने नजरिए से दुनिया को समझने का प्रयास करते हैं. समस्या तब होती है, जब हम देखने के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास के आधार पर फैसले करने लगते हैं!

यहां, समझिए कि देखने और विश्वास में अंतर गहरा है. जो देखने के आधार पर फैसले करते हैं, वह वर्तमान पर यकीन करने वाले होते हैं. जिनका भरोसा विश्वास पर होता है वह हर चीज में अतीत को अधिक महत्व देते हैं. अतीत को महत्व देना जरूरी है, लेकिन इतना नहीं कि वह हमारे वर्तमान संदर्भ से बाहर हो जाए.

Dear Zindagi
लड़कियों और महिलाओं के बारे में हमारा संकुचित रवैया इसी बात का प्रमाण है कि हम देखने के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास के आधार पर फैसले लेते हैं.


लड़कियों और महिलाओं के बारे में हमारा संकुचित रवैया इसी बात का प्रमाण है कि हम देखने के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास के आधार पर फैसले लेते हैं. 'जीवन-संवाद' को इस बारे में हर दिन संदेश मिलते हैं. हम अपने ही घर में अपनों के ही बीच उनके अलग अलग रवैये, दृष्टिकोण और एक दूसरे के बारे में विरोधाभासी निर्णयों के सताए हुए लोग हैं. मेरी मां को शिक्षा से इसलिए वंचित कर दिया गया था, क्योंकि उनके दो बड़े भाई कई संतानों के बाद जीवित बचे थे, इसलिए उनका लालन-पालन सावधानी से जरूरी था. कोई बात नहीं तब अधिकांश लोग ऐसे ही सोचते थे, लेकिन आज?

अब भी 'जीवन संवाद' को ऐसे संदेश मिलते हैं, जिनमें बेटी, बहन, भाभी, पत्नी के बारे में घर का रवैया कुछ ऐसा है, जैसे मानिए हम आज जो हैं उसकी अनदेखी करते हुए केवल अपने विश्वासों के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं. ‌‌‌‌‌‌‌एक तरफ हम ऐसे निर्णय ले रहे हैं दूसरी तरफ़ हम कह रहे हैं कि जीवन में तनाव बढ़ रहा है. घुटन बढ़ रही है. एक दूसरे के प्रति प्रेम कम हो रहा है.

यह सब करते हुए, जाने अनजाने में प्रेम करने वालों को अपनी संपत्ति समझने की भूल किए जा रहे हैं. अपने से जुड़े, निर्भर लोगों के बारे में हमारे फैसले तब तक सही, सटीक, स्नेहिल और सम्मानजनक नहीं होंगे, जब तक उनमें उनका नजरिया शामिल नहीं होगा. हमारी कोशिश होगी रिश्ते में हम अपनों का नजरिया, हित, चाहत अधिक से अधिक देखें, न कि अपना अधिकार. जैसे ही अधिकार देखते हैं दूसरों को संपत्ति मानने का भाव गहराई से हमारे भीतर आता जाता है.
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First published: July 10, 2019, 6:02 PM IST
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