#जीवनसंवाद: अपने प्रति हिंसा! ‌‌‌‌

कोई आपका कितना ही प्रिय क्यों ना हो, आप उसकी हर चीज के लिए स्वयं को दोष नहीं दे सकते! अपने प्रति होने वाली हिंसा से बचने की दिशा में यह पहला कदम है जो आपको उठाना है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 8:14 AM IST
#जीवनसंवाद: अपने प्रति हिंसा! ‌‌‌‌
एक गिलास में कितना पानी आता है? हमारा मन गिलास से बहुत अधिक बड़ा नहीं है!
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 8:14 AM IST
अक्सर हम हिंसा को शारीरिक रूप से जोड़कर देखते हैं. किन्हीं भी दो लोगों के बीच में अगर रिश्ते सामान्य नहीं हैं, तो उसमें हिंसा के तत्व किसी न किसी रूप में जरूर होंगे. अपने से जुड़े हुए किसी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार जो उसे दुखी करने वाला हो, बिना किसी ठोस कारण के हिंसा की श्रेणी में आता है.

हम मोटे तौर पर तीन प्रकार की गतिविधियों से संचालित होते हैं. पहला मन. दूसरा वचन. तीसरा काम. उदाहरण के लिए आप सोचते हैं, आपको किसी व्यक्ति को 'सबक' सिखाना है. शारीरिक रूप से आप ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं. आप उसे कुछ खरी-खोटी कहने में भी समर्थ नहीं हैं. पहली दोनों ही स्थितियों में सक्षम नहीं होने के कारण आप मन ही मन उसके लिए 'योजना' बनाते रहते हैं. लंबे समय तक ऐसा करने से आप अपने ही मन को बीमार करते रहते हैं. मन/दिमाग में जगह सीमित है. वहां प्रेम, स्नेह और वात्सल्य को रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि कहां से घृणा, क्रोध को हटाया जाए!

एक गिलास में कितना पानी आता है? हमारा मन गिलास से बहुत अधिक बड़ा नहीं है! उसके पास भी जगह सीमित है. मनोवैज्ञानिकों, मनोविश्लेषकों और डिप्रेशन पर काम करने वालों ने इस तीसरी स्थिति को सबसे खराब बताया है. जो मन में ही पकता रहता है, सबसे अधिक स्वयं के लिए ही पीड़ादायक है. यह एक प्रकार की अनजाने में अपने ही प्रति की गई हिंसा है. मैं किसी के द्वारा कही गई बात पर कितने दिन दुखी हो सकता हूं.

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एक गिलास में कितना पानी आता है? हमारा मन गिलास से बहुत अधिक बड़ा नहीं है!


किसी के खराब आचरण की सजा मैं कब तक स्वयं को दे सकता हूं. मुझे स्वयं का खयाल रखना होगा. जैसे गर्मी के तीखे दिनों में हम सब अलग-अलग चीज़ों से अपनी रक्षा करते हैं, वैसे ही मन की भी करनी है! मन को कुछ इस तरह तैयार करना होगा कि उसे बिना आपकी अनुमति के कोई और दुखी न कर सके. मन पर नियंत्रण संतुलित, सुखी जीवन की बुनियादी जरूरत है.

मेरे कुछ सुपरिचित, सुचिंतित मित्र कुछ समय पहले विपश्यना नाम की योग पद्धति का अनुभव लेकर लौटे हैं. इनसे विस्तार, रुचिपूर्वक हुए संवाद में कुछ ऐसी बातें मिलीं, जो जीवन के लिए उपयोगी हैं. मैं साझा कर रहा हूं, आप अपने अनुसार उनके उपयोग के लिए स्वतंत्र हैं. विपश्यना में मोटे तौर पर हमें अपनी सांसों का खयाल रखना सिखाया जाता है. हम गहरे मौन में जाना सीखते हैं. दूसरों से अधिक स्वयं पर नियंत्रण, स्वयं से संवाद कला की ओर बढ़ते हैं. इनमें से कुछ गतिविधियों जैसे अपनी सांसों का खयाल रखने के लिए आपको विशेषज्ञ के मार्गदर्शन की जरूरत है. लेकिन कुछ गतिविधियों जैसे गहरे मौन में जाना, स्वयं से संवाद, दूसरों को देखने का 'नजरिया ' हम स्वयं भी विकसित कर सकते हैं. मुझे खुशी है यह कहते हुए कि 'जीवन -संवाद' में हम इन चीज़ों पर सबसे अधिक बल दे रहे हैं. दुनिया को बदलने, जानने जितना ही जरूरी है, स्वयं को बदलना, गहराई से समझना! अपने को दूसरों से होने वाली हिंसा के साथ ही अपने प्रति अनजाने में हो रही हिंसा से बचाना!

कोई आपका कितना ही प्रिय क्यों ना हो, आप उसकी हर चीज के लिए स्वयं को दोष नहीं दे सकते! अपने प्रति होने वाली हिंसा से बचने की दिशा में यह पहला कदम है जो आपको उठाना है.
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First published: July 10, 2019, 6:11 PM IST
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