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#जीवनसंवाद: जितना साथ मिले एहसान है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 24, 2020, 12:22 PM IST
#जीवनसंवाद: जितना साथ मिले एहसान है!
#जीवनसंवाद: जितना साथ मिले एहसान है!

Jeevan Samvad: मन वहीं जाता है, जहां दुख की कोई सुई अटकी होती है. जैसे जीभ बार-बार वहीं जाती है, जहां दांतों में कुछ फंस जाता है.

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  • Last Updated: January 24, 2020, 12:22 PM IST
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मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा में से एक है, ऐसे लोगों का साथ छोड़ते जाना, जिनसे गहरा अनुराग रहा हो. जिनके बगैर कभी दुनिया का सपना न देखा गया हो. ऐसे लोग वक्‍त के अलग-अलग मोड़ पर जब मुड़ जाते हैं, तो इससे मन का असहज होना सामान्‍य है. लेकिन मन को असहज होने तक ही परेशान होने देना है. इससे आगे नहीं.

हम अपने आसपास ऐसे लोगों की बड़ी संख्‍या देखते हैं जो लोगों के साथ छोड़ देने से उबर नहीं पाते. वह स्मृतियों से इस तरह चिपके रहते हैं कि उनको इस बात का ख्‍याल ही नहीं रहता कि इससे वह स्‍वयं को ही सुख से वंचित कर रहे हैं.

‘जीवन संवाद’ को जयपुर से मिले एक ईमेल में सरोज तिवाड़ी ने लिखा है, ‘मैं अब तक उस दर्द से नहीं उबर सकी हूं, जो उनसे मिला जो मुझे छोड़ गए. जबकि यह ऐसे लोग थे जिनके साथ जीवन का वह हिस्‍सा बीता, जब जिंदगी में कुछ हासिल करने का जुनून था. ऐसे मित्र, रिश्‍तेदार अब होते हुए भी दूर हैं, जिनके कभी दूर होने का ख्‍याल ही नहीं आया.'

सरोज जी यही जिंदगी की रीत है. ऐसा ही होता है. जब हम यात्रा में होते हैं, तो किसी सुंदर जगह ठहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि अब आगे नहीं जाना. ठहरने की जगह कितनी ही मनभावन क्‍यों न हो, हमें आगे तो बढ़ना ही है. हम न चाहते हुए भी कुछ दिन बाद अपना सामान समेटकर आगे बढ़ते हैं. यह बहुत सरल नियम है. उसके बाद कुछ दिन उस जगह की याद रहती है, उसके बाद हम जिंदगी को दूसरे पड़ाव पर ले जाते हैं.


पाठक ‘जीवन संवाद’ के बारे में जानने के लिए नियमित रूप से लिख रहे हैं. उनके लिए यह छोटी-सी सूचना है कि जीवन संवाद के लेख किताब के रूप में ‘जीवन संवाद’ के नाम से उपलब्‍ध हैं. इनमें उन सभी सवालों पर संवाद हैं, जो हमारी जिंदगी में तनाव, निराशा और दुख घोलने का काम कर रहे हैं. यात्रा का यह सामान्‍य अनुभव हमारी जिंदगी को अनेक दुखों से निकालने में संभव है. मन वहीं जाता है, जहां दुख की कोई सुई अटकी होती है. जैसे जीभ बार-बार वहीं जाती है, जहां दांतों में कुछ फंस रहता है.

मन को ऐसे ही सरल, सक्षम और सुंदर बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम उसे अटकने से बचाए रखें. आज जो हो गया. उसे आज ही खत्‍म करें. सूरज सरीखे. सूरज रोज नए बादलों का सामना करता है. नए तरह के बादलों से टकराता है. बादल उसे घेर लेते हैं, लेकिन वह उनके प्रति बैर नहीं रखता. वह नई ऊर्जा से हर दिन हमें रोशनी देने आता है. उसके तन में थकान हो सकती है, लेकिन सूरज का मन नहीं थकता. उसके मन में नए बादलों के लिए तैयार रहने की बात तो हो सकती है, लेकिन वह न तो उनसे डरता है, न ही ऐसे बादलों के बीच ठहरता है, जो उसकी तपन को राहत देते हैं.

मेरे लिए सूरज एक जीवन दर्शन है. नि‍रंतर आने की प्रेरणा. निष्‍ठा और समर्पण से जुटे रहने की इच्‍छा है! हमें भी रोज जीना है. हर दिन जीना है. जीना ही है. इसका कोई विकल्‍प नहीं है. मन में हजार तरह के नकारात्‍मक भाव आते रहते हैं. आएंगे. यह ठीक उसी तरह हैं, जैसे वातावरण में हर तरह के संक्रमण मौजूद रहते हैं, लेकिन उनकी चपेट में वह अधिक आते हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है.मन भी एकदम ऐसे ही व्‍यवहार करता है. इसलिए मन को मजबूत बनाना है. उसे तनाव से लड़ने लायक बनाना है. उसे कांच की तरह नहीं, कवच की तरह रखना है. जीवन संवाद इसी दिशा में विनम्र प्रयास है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: January 24, 2020, 12:20 PM IST
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