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#जीवनसंवाद : कड़वी यादों का चक्रव्यूह!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 12:10 PM IST
#जीवनसंवाद : कड़वी यादों का चक्रव्यूह!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमें उन सभी दोस्‍तों, परि‍वार के बच्‍चों के प्रति संवेदनशील होना है, जिनको किन्‍हीं वजहों से अपने रिश्‍तों में संकट का सामना करना पड़ा. इससे टूटे मन को जुड़ने में मदद मिलेगी.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 12:10 PM IST
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आसान तो नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है. हमने ऐसा मान जरूर लिया है कि कड़वी यादों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता. यह मन पर ग्रहण की तरह छाई रहती हैं. सूर्य/चंद्र ग्रहण का धरती पर असर तो सीमित समय के लिए होता है. लेकिन कड़वी यादों के साए से मन को समय रहते मुक्‍त न किया जाए तो मन पर इसके घाव गहरे होते जाते हैं. यह धीरे-धीरे चिंता, दुख, उदासी में बदलने लगते हैं. इससे अंतर नहीं पड़ता कि मन को चोट कैसे लगी. असली सवाल है कि वह ठीक क्‍यों नहीं हो रही. यही सबसे अधिक ख्‍याल करने की बात है.

जिंदगी निरंतर बदलने वाले तट का नाम है. हम हर दिन बदलते हैं. मन पर अनेक बातों का असर पड़ता है. कुछ असर अस्‍थाई होते हैं. बारिश में भीगने सरीखे. कुछ देर में इसका असर खत्‍म हो जाता है. गर्म चाय की प्‍याली, थोड़ी गर्माहट से हम एकदम ठीक हो जाते हैं. लेकिन लगातार कई दिन तक बारिश में अनेक कारणों से भीगने पर हमारे बीमार पड़ने का खतरा बना रहता है.

एकदम यही बात मन के साथ होती है. दोस्‍त साथ छोड़ देते हैं. जिससे प्रेम करते हैं, वह अपने वायदे तोड़कर दूसरे रास्‍ते न‍िकल जाता है. उसके बाद जिसका दामन थामते हैं, उसके और आपके, दोनों के मन पुरानी स्मृति की गलियों में भटकते रहते हैं. रिश्‍तों को थोड़ा वक्‍त चाहिए होता है, जिससे वह स्मृति की धूल को साफ कर सकें. लेकिन हमारा समाज, परिवार अक्‍सर हड़बड़ी में होता है. हमें लगता है, अकेला आदमी ठीक नहीं.

लड़के/लड़की के माता-पिता हमेशा इसी बात से परेशान रहते हैं कि उनके बच्‍चे शादी नहीं कर रहे. उनको यह विचार चैन से रहने नहीं देता. असल में यह उनको विरासत में मिला है. उनके माता-पिता भी एकदम ऐसे ही चिंता करते थे. इसलिए वह भी उसी तरह आपकी चिंता करते रहते हैं.

हम कितने अधिक नकलची हैं. हमारे कपड़े बदल गए. मकान बदल गए. जीवन मूल्‍य बदल गए. लेकिन हमारे बच्‍चों के जीवन में हस्‍तक्षेप को लेकर कोई परिवर्तन नहीं आया.


इस रवैए से ऐसे युवा सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जिनका मन/दिल किसी रिश्‍ते की चोट खाया हो. वह हमसे सहानुभूति नहीं चाहते. केवल स्‍नेह चाहते हैं. वह नहीं चाहते कि बार-बार कोई उनके जख्‍म कुरेदे.

वह केवल इतना चाहते हैं कि उनकी बात, अनुभव को स्‍नेह मिले. उनको समझने की कोशिश की जाए. हर गांठ को सुलझाने के लिए समय चाहिए. जल्‍दबाजी में और अधिक गांठ पड़ने का खतरा बना रहता है.इसलिए, हमें उन सभी दोस्‍तों, परि‍वार के बच्‍चों के प्रति संवेदनशील होना है, जिनको किन्‍हीं वजहों से अपने रिश्‍तों में संकट का सामना करना पड़ा. इससे टूटे मन को जुड़ने में मदद मिलेगी. उनको सुनिए. गहरे संयम के साथ उन्‍हें सुनिए, जो किसी रिश्‍ते में चोट खाए बैठे हैं.

उनको स्‍नेह, संयम और साथ की जरूरत है. इससे उन्‍हें सामान्‍य होने में मदद मिलेगी. ध्‍यान रहे कि दुखी व्‍यक्ति सामान्‍य नहीं होते. ठीक वैसे ही जिस तरह बीमार व्‍यक्ति सेहतमंद नहीं होते. जब तक बीमारी से पूरी तरह उबर न जाएं.

अपने देश में मानसिक परेशानी, बाधा और दुख को ठीक करना तो दूर, उस पर ठीक से संवाद तक नहीं होता. जब तक हम बात नहीं करेंगे, हम जिंदगी में आने वाले उतार-चढ़ाव, परिवर्तन और कड़वी यादों से मुक्‍त नहीं हो पाएंगे.


जीवन के प्रति गहरी आस्‍था, आशा में यकीन रखने के छोटे से अभ्‍यास से हम जिंदगी के बड़े-बड़े संकट संभाल सकते हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: January 27, 2020, 12:10 PM IST
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