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#जीवन संवाद : आमंत्रित दुख!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 23, 2020, 8:21 AM IST
#जीवन संवाद : आमंत्रित दुख!
जीवन संवाद

हम आशा और निराशा के तटों से गुजरते हुए दुख के घाट पर पहुंचते हैं. हर दिन की यही कहानी है.

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  • Last Updated: February 23, 2020, 8:21 AM IST
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दुख को भी आमंत्रित किया जाता है. हमारा मन इतनी अधिक तीव्रता से विचारों की रचना करता है कि अगर उसे समय रहते नहीं संभाला जाए तो वह आपको दुख की अनचाही गलियों में धकेलने की शक्ति रखता है. इस सवाल का पूरी तरह उत्तर हां में है. दुख, हमारे रचे हुए सुख का दूसरा पहलू है. दिन है तो रात तो होगी. सुबह है तो शाम तो होगी. ठीक इसी तरह दुख भी है अगर आपने सुख चाहा है.

हमने जीवन में कुछ बातों को इतना अधिक सिद्धांत (थ्योरी) मान लिया कि उनका व्यवहार (प्रैक्टिकल) करना ही बंद कर दिया. दुख का भी कुछ ऐसा ही हिसाब-किताब है. हम आशा और निराशा के तटों से गुजरते हुए दुख के घाट पर पहुंचते हैं. हर दिन की यही कहानी है. हमने मन को इतना अधिक नाजुक, संवेदनशील बना लिया है कि वह छोटी-मोटी बात पर चटकने लगता है. दुख को अतिथियों सरीखे आमंत्रित करने लगता है.

अपने को संभालना दुनिया को संभालने की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल काम है. जब आप दूसरों के लिए काम कर रहे होते हैं तो एक तरह के नैतिक बोध में बने होते हैं. दायित्व बोध बहुत से अनचाहे संकट से आपको बचा लेता है.


लेकिन जैसे ही अपनी बारी आती है चीजें पलट जाती हैं. हम मन की दुनिया में अक्सर जीवन रहस्य की बुनियादी बातों की अनदेखी करते हैं. प्रकृति के पास किसी चीज की कमी नहीं है. संसार में सब कुछ पर्याप्त है. कमी अगर किसी चीज की है तो वह केवल सही तरह से इच्छा की है. सपना कैसे देखा जाए, यह सपने से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है. एक बार हमने अपने मन को पीड़ित मान लिया तो उसके बाद दिमाग उसमें एक हजार ऐसी चीजें छोड़ देगा, जिससे कुछ ही देर में साबित हो जाएगा कि आप दुनिया के सबसे दुखी व्यक्ति हैं.



हमारा दिमाग कुछ इस तरह बना है कि हम जैसी चीजों से उसे तैयार करते हैं वह वैसे ही चीजें हमें पलट कर देता है. दिमाग में स्नेह का निवेश कीजिए. प्रेम की सही मात्रा रखिए. विश्वास बराबर मिलाते रहिए, तो वह स्नेह, प्रेम और विश्वास से भरी बातें आपको लौट आता रहेगा.


लेकिन अगर इनकी मात्रा में थोड़ी भी गड़बड़ी होती है, तो दिमाग आपको शंका, अविश्वास, दुविधा की ओर धकेलने लगता है. सुख और दुख अंतर करते ही दिमाग आपको संसार के सबसे दुखी व्यक्ति के रूप में देखने के एक से बढ़कर एक 'चश्मे' उपलब्ध करवा देता है. 'महाभारत' जीवन की सबसे बड़ी कहानियों में से एक है. उसके बाहर शायद ही संसार की कोई समस्या हो. इसीलिए उसका नाम महाभारत रखा गया था. संघर्ष घर को जीवन से काट कर देखने की कोशिश ही हमें दुख की ओर धकेलती है. संघर्ष, दुख, तकलीफ जीवन का हिस्सा हैं. जीवन के साथ ही इनका अस्तित्व है. महाभारत की सबसे खूबसूरत पंक्तियों में से एक है- 'सुखे दुखे समेकृत्वा, लाभा लाभौ जया जयौ'. इसका अर्थ है, सुख-दुख, लाभ-अलाभ, जय अथवा पराजय को समान भाव से लेना चाहिए. जीवन के प्रति यह दृष्टिकोण आपको अनेक दुखों से दूर रखने के साथ ही उन्हें आमंत्रित करने से भी बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. दुख संभालने की कला के बारे में कुछ समय पहले आई मेरी किताब 'जीवन संवाद' में विस्तार से संवाद है. आपके सवालों की हमेशा की तरह प्रतीक्षा रहेगी. दुख को संभालना जीवन को पाने, नौकरी करने, धन अर्जित करने जितना ही जरूरी काम है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: February 21, 2020, 4:35 PM IST
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