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#जीवनसंवाद: प्रेम और संदेह!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 12, 2020, 3:16 PM IST
#जीवनसंवाद: प्रेम और संदेह!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: दुनिया की खिड़की हमारे लिए इससे पहले कभी इतनी अधिक नहीं खुली थी. इसलिए इतनी तरह के संकट भी नहीं थे.अब जबकि मन के पास इतने अधिक विकल्प हो गए हैं, उसके प्रेम की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 3:16 PM IST
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प्रेम और संदेह दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं. प्रेम तक हम संदेह के घने जंगल, पथरीली राह को पार करके ही पहुंचते हैं. संदेह का कोहरा छंटते ही हम प्रेम तक पहुंचते हैं. लेकिन यह जीवन किसी एक यात्रा का नाम नहीं है. इसमें सैकड़ों यात्राएं गुथी हुई हैं. एक मन हजारों अनुभवों से गुजर कर बना है. इस अर्थ में मन के भीतर अनेक अंतर्मन हैं. इन अंतर्मन से होकर हमारा मन बना. तो यह जीवन क्या हुआ? कुछ नहीं, बस हमारे मन की यात्रा ही हुआ.

हम संदेह के घने कोहरे को पार करके प्रेम तक पहुंचते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि संदेह लौटकर नहीं आता. जीवन अगर सूरज है तो संदेह बादल. दोनों का रिश्ता नज़दीकी है. हम आज इस पर इसलिए बात कर रहे हैं, क्योंकि बीते दिनों प्रेम और संदेह को लेकर बहुत से सवाल 'जीवन संवाद' को मिले. प्रेम और संदेह दोनों एक-दूसरे के इतने निकट है कि इन्हें अलग-अलग रखकर समझना मुश्किल है.

जब हमारी जिंदगी में कोई प्रेम के साथ दाखिल होना चाहता है तो पहले -पहल हमें संदेह ही होता है. मन का पहला काम ही है संदेह करना. मनुष्यता के नायकों की ओर देखेंगे तो पाएंगे कि संदेह सबके मन का प्रस्थान बिंदु होता है. जैसे-जैसे हम इसे पार करते जाते हैं हमारा मन प्रेम और अनुराग के नित्य नए पड़ाव पार करता जाता है. जीवन में विविधता का अनुभव हमारे मन को विशाल और उदार बनाता है. विश्वास बनता धीमे-धीमे है लेकिन टूटता अक्सर कांच के बर्तन की तरह अनायास ही है. इन दिनों हमारा मन ऐसा हो चला है कि वह छोटी छोटी चीजों से पिघलने लगता है. आसानी से पलटने लगता है.

भारत में परिवार नाम की संस्था स्वयं को नए संकट से घिरा पा रही है. इसके मूल कारणों में प्रेम पर संदेह के बादल घने होते जाना है. दुनिया बदल रही है, लेकिन हमने मन वही पुराना वाला बना रखा है. अपने मन को हमें नई दुनिया के अनुकूल दीक्षित करना होगा.


रिश्ते तेज़ी से बदल रहे हैं. स्त्री-पुरुष संबंधों में हमारा मन सबसे अधिक चोट खाता है. क्योंकि दोनों ही मन बदलते समय के साथ तालमेल बैठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पुरुषों ने कभी भी भारत में स्त्री को इतने अधिकार, आजादी और दुनिया के बीच घुला मिला नहीं पाया था, जितना आज पा रहे हैं. यह उनकी बेचैनी का बड़ा कारण है.


पारंपरिक रिश्तों के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है. दुनिया की खिड़की हमारे लिए इससे पहले कभी इतनी अधिक नहीं खुली थी. इसलिए इतनी तरह के संकट भी नहीं थे. अब जबकि मन के पास इतने अधिक विकल्प हो गए हैं, उसके प्रेम की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई. जब तक विकल्प नहीं होते हैं प्रेम पर संकट नहीं होता है. यह बात थोड़ी सी कड़वी है लेकिन इसे व्यावहारिक जीवन से जोड़ कर देखेंगे तो पाएंगे कि यह एकदम स्पष्ट और सीधी बात है.
प्रेम की परीक्षा वहीं से शुरू होती है, जहां से संदेह के बादल घने होते हैं. प्रेम गहरा होता जाता है तो यह बादल हल्के होते जाते हैं. बादल गहरे होते जाते हैं तो प्रेम कमजोर होता जाता है. प्रेम और संदेह की कड़ी में सबसे खास बात यह है कि हमें उस मन पर विश्वास करना होगा, जो प्रायश्चित के आंसुओं में धुला हुआ हो. आंसुओं से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है. सच्चे मन से केवल माफी मांगना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उतना ही जरूरी है सच्चे मन से माफ करना! उस माफी को स्वीकार करना जो मांगी जा रही है.


संभव है कुछ अवसरों पर आपको लगे कोई आपको ठग रहा है, ऐसे वक्त में हमारी मदद के लिए कबीर दास आ जाते हैं. कबीर समझाते हैं- 'ठगने से बेहतर है ठगे जाना'. अंततः हमें प्रेम के साथ ही जाना है. मनुष्यता का अंतिम ठिकाना प्रेम ही है. संदेह के बादल कितने भी घने हो हमें भरोसे और प्रेम के साथ ही जाना है. जैसे -जैसे हम प्रायश्चित और आंसुओं का मूल्य समझते जाएंगे बेहतर मनुष्य होते जाएंगे. कभी इस पर मत रुकिए कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ! यह सोचिए कि मुझे इसके लिए प्रकृति ने क्यों चुना. बारिश के साथ कभी-कभी ओले भी पड़ते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हम बारिश की प्रतीक्षा बंद कर दें. कड़वे अनुभव हमारे बड़े जीवन की यात्रा का एक पड़ाव भर हैं. यहां ठहरना नहीं है. बस चलते जाना है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 5, 2020, 9:56 AM IST
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