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#जीवनसंवाद: प्यार सरल नहीं है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 20, 2020, 11:27 AM IST
#जीवनसंवाद: प्यार सरल नहीं है!
#जीवनसंवाद: प्यार सरल नहीं है!

Jeevan Samvad: प्रेम और आस्था का आंतरिक संबंध है. जिसके भीतर प्रेम नहीं होगा, उसमें आस्था नहीं होगी. जिसमें आस्था नहीं होगी, उसका प्रेम में होना हमेशा मुश्किल होगा.

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  • Last Updated: February 20, 2020, 11:27 AM IST
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'अपराध करने के लिए चाहिए
कठिन दुस्साहस,
साहस उससे भी अधिक चाहिए
प्रेम करने के लिए.'



                             - डॉ. विजय बहादुर सिंह


आज संवाद की शुरुआत खूबसूरत कविता से इसलिए कि यह जीवन और प्रेम के अंतर्संबंध को गहराई से रेखांकित करती है. हम प्यार को कितना सरल मान बैठे, जबकि इसके लिए गहरा धैर्य, स्नेह और सहनशीलता चाहिए. इनके बिना प्रेम संभव नहीं. प्यार की कमी से ही दुनिया इतनी खुरदरी और रूखी हो चली है! प्यार करने के लिए अपने भीतर कितना कुछ सहना होता है. कितना कुछ सुनना होता है. तब जाकर उसका अंकुर आकार लेता है. जिसके जीवन में प्यार नहीं, स्नेह नहीं, वह कठोर न हुआ, तो क्या होगा. कठोरता प्रेम की अनुपस्थिति है.

'जीवन संवाद' के विभिन्न संवाद सत्रों में इस बात पर सबसे ज्यादा सवाल होते हैं कि- हम भले हैं, लेकिन दुनिया कठोर है. तो हमें भी कठोर होना होता है. यह तो कुछ ऐसी बात हुई कि चंदन ही सांपों के डर से अपना स्वभाव बदल ले. हमारे जैसे लोग दुनिया में बहुत से हैं. लाखों की संख्या में हैं. यह हमारी कमी, संवाद की अनुपस्थिति है कि हम उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं. अपने जैसे लोगों तक पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है. हां, कठिन जरूर है. और जो चीज हमें सरलता से मिल जाती है, हमेशा मानिए कि उसकी बहुत कीमत नहीं है.

प्रकृति हमें जो कुछ देती है, वह असल में इसी शर्त पर देती है कि हम उसे कितना संभाल सकते हैं. जो कुछ भी हमें मिला है, उसमें हमारे अपने होने की भूमिका दूसरे किसी भी कारण के मुकाबले बहुत अधिक है. प्रेम की कमी हमें चीजों को सीखने से रोकती है.


प्रेम और आस्था का आंतरिक संबंध है. जिसके भीतर प्रेम नहीं होगा, उसमें आस्था नहीं होगी. जिसमें आस्था नहीं होगी, उसका प्रेम में होना हमेशा मुश्किल होगा. इसलिए, प्रेम करना सरल नहीं, मुश्किल काम है.


मैं अपने जीवन में ऐसे केवल दस ही लोगों से मिलने का दावा कर सकता हूं, जो प्रेम करना जानते हैं. उनके भीतर साहस है प्रेम करने का. नफरत और घृणा करने के लिए मनुष्य को आत्मा के भीतर नहीं जाना पड़ता. यह दोनों तो सतह पर ही बैठे होते हैं. यह पेड़ पर बैठे ऐसे परिंदे हैं जो जरा-सी आहट से उड़ जाते हैं, उन्हें वृक्ष से कोई सरोकार नहीं होता. उन्‍हें आश्रय देने वाले की जरूरत तो होती है, लेकिन उससे अनुराग नहीं होता.

समाज में हिंसा बढ़ने के बड़े कारणों में एक यह भी है. हम धीरे-धीरे अपने आसपास की दुनिया से कट रहे हैं. हमने सोशल मीडिया के जरिए जो आभासी (वर्चुअल) दुनिया बनाई है, उसमें डूबते-उतराते रहते हैं. हमारे पास परिवार और बच्‍चों से ठीक से, प्‍यार से बातचीत का समय नहीं, लेकिन हम सोशल मीडिया के लाइक्‍स, मैंसेजर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.


पूरी दुनिया में क्‍या चल रहा है, हम उसकी हर पल की खबर से जुड़े हैं, लेकिन अपने ही परिवार से कटते जा रहे हैं. बच्‍चे शिकायत कर रहे हैं कि माता-पिता उनसे बात करने की जगह उनकी ओर लैपटॉप और मोबाइल उछाल रहे हैं. बच्‍चों से कहा जा रहा है- हमारा पीछा छोड़ो, मोबाइल ले लो. कार्टून देखा. कुछ भी देखो, लेकिन हमें थोड़ा वक्‍त दे दो. इस तरह का व्‍यवहार बढ़ता जा रहा है. उसके बाद भी हम यह मानने को तैयार नहीं कि प्‍यार करना मुश्किल है.

बच्‍चों, परिवार, पति-पत्‍नी के साथ अपने व्‍यवहार को पुराने, परंपरागत चश्‍मे से देखने का समय खत्‍म हुआ. क्‍योंकि दुनिया बदल रही है. जब दुनिया बदल रही है तो हम कैसे एक चौराहे पर खड़े रह सकते हैं. हमें अपने रिश्‍तों में प्रेम की मात्रा का वैसे ही ख्‍याल रखना होगा, जैसे हम अपने हीमोग्‍लोबिन का रखते हैं.

प्‍यार इससे कम देखभाल में जिंदगी में रस नहीं घोल पाएगा. खुद को तनाव और डिप्रेशन के खतरे से बचाने के लिए हमेशा इसके स्‍तर के प्रति सजग रहना होगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: February 19, 2020, 11:43 AM IST
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