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#जीवनसंवाद: मन और गुस्‍सा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 29, 2020, 9:24 AM IST
#जीवनसंवाद: मन और गुस्‍सा!
#जीवनसंवाद: मन और गुस्‍सा!

Jeevan Samvad: हमारे बीच गुस्‍सा और हिंसा पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ती जा रही है. हम निरंतर गुस्‍सैल समाज की ओर बढ़ रहे हैं.

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  • Last Updated: January 29, 2020, 9:24 AM IST
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गुस्‍से पर हमें बहुत से कहानियां मिल जाती हैं. एक से बढ़कर एक. बचपन से हमें सिखाया जाता रहा है कि गुस्‍सा करना सबसे अधिक हमारी सेहत के लिए हानिकारक है. इसके बाद भी हम अब तक शायद ही गुस्‍सा करने से पीछे हट रहे हों. बल्कि इस उल्‍टा हो रहा है. हमारे बीच गुस्‍सा और हिंसा पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ती जा रही है. हम निरंतर गुस्‍सैल समाज की ओर बढ़ रहे हैं. हम किन बातों पर गुस्‍सा हो रहे हैं. किन चीजों पर गुस्‍सा हो रहे हैं.

अगर थोड़ा आराम से सोचेंगे तो हमें पता चलेगा कि इसकी कोई ठोस वजह नहीं है. सबसे बड़ा कारण हमारे धैर्य का कम होते जाना, भीतर से संयम का चुकते जाना है. भीतर से खाली होते जाना है. रिक्‍त होते जाना है. गुस्‍से की बड़ी वजह जीवन की आस्‍था और विश्‍वास के रंग का कच्‍चा होते जाना है. चिंता और गुस्‍से का साथ बड़ा गहरा है. चिंता से गुस्‍सा बढ़ेगा. गुस्से से चिंता सख्‍त होती जाएगी.

एक बारह तेरह बरस के एक बच्‍चे को बहुत गुस्‍सा आता था. उसके पिता ने उसे बहुत समझाया लेकिन उसका गुस्‍सा नियंत्रण से बाहर था. एक दिन पिता ने बेटे को खूब सारी कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे गुस्‍सा आए, वह घर के सामने लगे पेड़ में वह कीलें ठोंक दे. पहले दिन लड़के ने पेड़ में तीस कीलें ठोंकी. अगले कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण करना आ गया.


अब वह पेड़ में प्रतिदिन इक्का-दुक्का कीलें ही ठोंकता था. उसे यह समझ में आ गया कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना सरल है. एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी. जब उसने पिता को यह बताया तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल लाओ.

लड़के ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं. जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गए.

पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा, 'तुमने अच्छा काम किया, लेकिन पेड़ के तने पर बने सैकड़ों कीलों के इन निशानों को देखो. अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा. हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे. तुम्हारे हजार बार माफी मांगने के बाद भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा. इसलिए, अपने मन, विचार और क्रिया से कोई भी ऐसा काम मत करना, जिसके लिए तुम्‍हें बाद में पछताना पड़े.'

हम सब जो इस बच्चे से उम्र में काफी बड़े हैं, उसके जैसे ही दूसरों के मन पर कीलें ठोंके जा रहे हैं. हमारा गुस्सा प्रेम की कमी से उपजा है. जब प्रेम नहीं होता है तो कुंठा और गुस्सा ही मन में कब्जा जमाए रहते हैं. मन को ऐसे ही खड़े रहते हैं जैसे बादल घुमड़-घुमड़ कर सूरज को घेरते हैं. सूरज के पास प्यार और स्नेह की गहरी चादर होती है. इससे वह थोड़ी देर में ही बादलों से मुक्त हो जाता है.हममें से ऐसे लोग जिनके पास भरपूर संख्या में मित्र और परिवार का साथ है. उनके मन में तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच भी स्नेह बना रहता है. प्रसन्नता और आनंद का भाव साथ नहीं छोड़ता. जबकि ऐसे लोग जिनके पास मित्रों की कमी है, दुखों को साझा करने वालों की कमी है. मुश्किल वक्त में वह गुस्से की ओर बढ़ते जाते हैं. इसलिए, अपने परिवार और मित्रों का ख्याल रखिए. गुस्सा धीरे-धीरे मन में जमता है. लेकिन एक बार जमने के बाद यह स्वभाव बन जाता है. इसे स्वभाव नहीं बनने देना है. मन में मन के विचार आते जाते रहते हैं. कभी-कभी उनका उदास होना, परेशान और गुस्सैल हो जाना स्वाभाविक भी होता है लेकिन इसे स्थाई नहीं बनाना है. सूरज की तरह हर तरह के बादलों से पार निकलते जाना है, रोशनी की ओर!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: January 29, 2020, 9:24 AM IST
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