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#जीवनसंवाद: बच्‍चों के लिए आसान होना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 10, 2020, 9:21 AM IST
#जीवनसंवाद: बच्‍चों के लिए आसान होना!
#जीवनसंवाद: बच्‍चों के लिए आसान होना!

Jeevan Samvad: स्‍नेह, खानपान, शिक्षा सरीखी चीज़ है. यह और बात है कि हमने इसे केवल सुविधा से जोड़ दिया है. हम बच्‍चों को सुविधा देकर यह नहीं मान सकते कि उन्‍हें स्‍नेह की जरूरत नहीं है. इससे बच्‍चों की जिंदगी आसान नहीं होती.

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  • Last Updated: February 10, 2020, 9:21 AM IST
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हम बच्‍चों के लिए आमतौर पर बहुत अधिक आलोचनात्‍मक होते हैं. हम हमेशा यह महसूस करते हैं कि हमारे जमाने में तो संकट बहुत गहरे थे, अब के बच्‍चों के लिए जो दुनिया है, वह बहुत सरल है. यह किसी खास व्‍यक्ति का नजरिया हो सकता है, लेकिन यह सच्‍चाई नहीं है. अगर हमारे बच्‍चे उस समय पैदा नहीं हुए जब आपके हिसाब से दुनिया मुश्किल थी, तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं. किसी भी समय की तुलना का कोई अर्थ नहीं. यह बस हमारे मन की भावुकता है. दुनिया हमेशा एक सरीखी मुश्किल, आसान हेाती है. जब कभी हम छोटे थे, तो हमारे संकट दूसरे थे. आज जो बच्‍चे छोटे हैं, उनके सामने दूसरी मुश्किलें हैं.

आपके लिए दादा-दादी, संयुक्‍त परिवार एक सहज सुख था. अब यह दुर्लभ है. हममें से अब हर कोई इतना सुखी नहीं है कि वह बुजुर्गों की छांव में रहे. हर व्‍यवस्‍था की कुछ मुश्‍किल होती है. संयुक्‍त परिवार की भी थी. उसमें निजता एक संघर्ष थी. निर्णय करने के तरीके पर असहमति थी. अधिकार के सवालों पर भी भारी असहमति थी. इसलिए, हम धीरे-धीरे निजी परिवार की ओर बढ़ गए. परिवार का अर्थ घर से होते हुए फ्लैट पर सिमट गया. यह बात दूसरी है कि इससे हमारे बच्‍चों की दुनिया मुश्किल होती गई.

हमारे पास इस बात के लिए पर्याप्‍त शोध हैं जो यह बताते हैं कि बुजुर्गों के साथ रहने वाले बच्‍चों का बचपन कहीं अधिक स्‍नेह से भरा हुआ है. ऐसे बच्‍चे अधिक खुशहाल, आनंद‍ित, प्रसन्‍न पाए गए हैं जिन पर दादा-दादी/नाना-नानी के स्‍नेह की छांव है. ऐसे बच्‍चों का मानसिक विकास कहीं अधिक संपूर्णता में हुआ तो पर‍िवार का स्‍नेह हासिल करने में कामयाब रहे. दूसरी ओर ऐसे बच्‍चे मुश्किल का सामना करने में सहज नहीं होते, जिनका पूरी तरह से स्‍नेहन न हुआ हो.


स्‍नेह, खानपान, शिक्षा सरीखी चीज़ है. यह और बात है कि हमने इसे केवल सुविधा से जोड़ दिया है. हम बच्‍चों को सुविधा देकर यह नहीं मान सकते कि उन्‍हें स्‍नेह की जरूरत नहीं है. इससे बच्‍चों की जिंदगी आसान नहीं होती.

आप अपने पांच से पंद्रह बरस तक के बच्‍चे का हाथ मजबूती से थामे हुए जब उसे बाजार में घुमा रहे होते हैं. दुनिया दिखा रहे होते हैं तो वह कैसा महूसस कर रहा है, केवल वही जानता है. उसे आपका साथ चाहिए. वह हाथ जो आपने थामा हुआ वह उसके भीतर दुनिया से लड़ने का लोहा भरता है. हमें बचपन के वही पल प्रिय हैं, जिनमें हमें समझा गया. समय के गुस्‍से से बचाने वाले अपनों के शब्‍द अक्‍सर ही हमारे ख्‍याल में चहलकदमी करते हैं. बचपन इनसे आसान होता है. वह सुविधा से सुख हासिल कर सकता है, प्रेरणा नहीं.


इसलिए, बच्‍चों को सुविधा की जगह अधिकतम स्‍नेह देने का ख्‍याल हमेशा मन में होना चाहिए. उनके साथ बिताया गया समय ही उनके लिए सबसे बड़ा उपहार है.
हमारे अधिक कमाने, कुछ बेहतर हासिल करने की होड़ में सबसे अधिक किसी का नुकसान हुआ तो वह केवल बच्‍चे हैं. हम समझते हैं, हम बच्‍चों के लिए बेहतर संसाधन जुटाकर उनकी दुनिया को कोमल बना रहे हैं. लेकिन असल में इसका उल्‍टा हो रहा है. हम उनका समय, साथ उनसे लेकर उन्‍हें सुविधा का संसार देने में जुटे हैं.


यह एक किस्‍म की उल्‍टी गिनती है. कभी बच्‍चों से एकदम शांत होकर, उदार मन और स्थिर चित्‍त के बीच उनसे पूछिए, वह आपसे क्‍या चाहते हैं. उनका जवाब वही होगा, जो हमारे माता-पिता का है. बुजुर्गों और बच्‍चों के ख्‍याल जीवन के एक मोड़ पर एक सरीखे हो जाते हैं. जब दोनों को केवल आपसे स्‍नेह होगा तो उनकी आपसे अपेक्षा एक जैसे स्‍नेह की होगी. हमें इस स्‍नेह की चादर को मैला होने से बचाने के साथ मजबूत करते रहना है.

इससे बच्‍चों का जीवन आसान होता है. उनका आपसे अनुराग जितना सुलझा, स्‍नेहिल होगा आपसे उनके रिश्‍ते एकदम वैसे ही होंगे. हमें बच्‍चों का जीवन आसान करने के बारे में सोचना चाहिए. बाकी उलझनें बच्‍चे बस स्‍वयं सुलझा लेते हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 7, 2020, 10:40 AM IST
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