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#जीवन संवाद: आत्‍महत्‍या और घर का तनाव!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 28, 2020, 2:34 PM IST
#जीवन संवाद: आत्‍महत्‍या और घर का तनाव!
#जीवन संवाद : आत्‍महत्‍या और घर का तनाव!

Jeevan Samvad: स्वयं को सोशल मीडिया की बंद हवेली से निकालने का समय आ गया है. एक-दूसरे मिले बिना हम आत्‍महत्‍या के संकट को केवल बढ़ाते जाएंगे. यह थमने वाला नहीं!

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  • Last Updated: January 28, 2020, 2:34 PM IST
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हमारे देश में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारी का काम क्‍या है? आपके बहुत से उत्‍तर हो सकते हैं, लेकिन संभव है, वह नहीं जिसकी बात मैं यहां करने जा रहा हूं. मेर‍े लिए भारत में सबसे खतरनाक बीमारी का नाम है, आत्‍महत्‍या. सबसे अधिक मुश्किल यह है कि हम अभी इसे बीमारी समझने से भी बहुत दूर हैं. जबकि यह हमारे सभी रक्षा द्वारों को पार करते हुए घर तक पहुंच गई है.

एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े बता रहे हैं कि 2018 में भारत में हुई कुल आत्‍महत्‍या में घरेलू महिलाओं का प्रतिशत 17.2 तक पहुंच गया है. नवभारत टाइम्‍स की एक र‍िपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं की आत्‍महत्‍या की दर दुनिया की दर के मुकाबले दोगुनी हो गई है. भारत में महिलाओं के बीच आत्‍महत्‍या की औसत उम्र 15 से 49 वर्ष की है. ऐसे में कहा जा सकता है कि हम उन महिलाओं की देखभाल, स्‍नेहन में बहुत पीछे छूट गए हैं, जो घर पर हैं. कामकाजी नहीं हैं.

घर के तनाव से जुड़ी दिल्‍ली में जनवरी दो बड़ी घटनाएं हुईं. गुड़गांव में सॉफ्ट डिंक बनाने वाली कंपनी के मैनेजर की पत्‍नी ने घर में खाने की मेज पर हुई कुछ अप्रिय बातचीत के बाद घर की बालकनी से छलांग लगा दी. उनको नहीं बचाया जा सका. यहां अब तक परिवार के बीच रिश्‍ते असहज होने की बात ही सामने आई है. कोई आर्थिक संकट नहीं है.

हम ‘जीवन संवाद’ में बार-बार इस बात का जिक्र कर रहे हैं कि जिसे आप जिंदा रहकर नहीं बदल सकते, उसे मरकर बदलना भी संभव नहीं. इसलिए, अलग होने का विकल्‍प तो चुना जा सकता है, लेकिन मरकर जीवन बदलने से कुछ नहीं बदलेगा. कम से अपने मासूम बच्‍चों को दूसरों की करुणा के भरोसे छोड़ने का कोई अर्थ नहीं.


दूसरी घटना भी इससे बहुत अलग नहीं है. प्रतिष्‍ठि‍त एटलस कंपनी के मालिकों में से एक की पत्‍नी ने दिल्‍ली की ऐसी कॉलोनी में स्वयं को बंद करके आत्‍महत्‍या का रास्‍ता चुना. जहां घर बसाने का सपना देखना ही लाखों लोगों की हसरत है. सभी तरह की सुख-सुविधा से भरे पूरे माहौल में घर की मालकिन ने आत्‍महत्‍या का विकल्‍प चुना. यह दोनों किस्‍से उन्‍हीं महिलाओं के बीच से आए हैं जिनकी संख्‍या कुल आत्‍महत्‍या के 17 प्रतिशत के बराबर है. यह बहुत बड़ी संख्‍या है.

असल में मन की बनावट ही कुछ ऐसी है कि उसे हर समय कोई चुनौती चाहिए. पति-पत्‍नी के बीच तब तक सब कुछ ठीक रहता है, जब वह दुनिया से लोहा ले रहे होते हैं. संकट आरंभ ही वहां से होता है, जब हम बाहरी संकट से मुक्‍त होकर निजी जिंदगी की ओर लौटते हैं. हम दुनिया का तनाव आसानी से संभाल लेते हैं. नौकरी, रिश्‍तेदार, दोस्‍त इन सबसे हम आसानी से निपट लेते हैं. लेकिन जैसे ही हम अपनी छोटी-सी दुनिया घर के भीतर प्रवेश करते हैं. हम तनाव को नहीं संभाल पाते.

हम अभी बाहर की चिंता में घुलने वाले लोग हैं. इस नजरिए को बदलने की दरकार है. थोड़ा समय के भीतर रहने की भी जरूरत है. बच्‍चे और घर के वह सदस्‍य जिनका बाहर कोई दायरा नहीं है, उनके लिए समानांतर दुनिया बनाए बिना बात नहीं बनने वाली.आत्‍महत्‍या का संकट कभी इतना संक्रामक, गंभीर नहीं था. यह बदले, अकेले पड़े समाज का संकट है. हमें नए ढंग से समूह में रहने का चलन सीखने की जरूरत है. अपने को सोशल मीडिया की बंद हवेली से निकालने का समय नजदीक आ गया है. एक-दूसरे से मिले बिना हम इस संकट को केवल और केवल बढ़ाते जाएंगे. यह थमने वाला नहीं. इसके लिए सबसे जरूरी है, एक दूसरे को समय देना. सुनना. प्रेम और गहरी शांति से. दुनिया विश्‍व युद्ध के पहले भी संवाद की बात कर रही थी, उसके बाद भी संवाद की ओर ही बढ़ती है.

मन की ऐसी कोई गांठ नहीं, जिसका समाधान न हो. बस उसके संवाद की ओर बढ़ने की देर है. ‘जीवन संवाद’ यही विनम्र अनुरोध निरंतर कर रहा है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: January 28, 2020, 2:34 PM IST
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