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#जीवनसंवाद: मैं ही क्‍यों!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 12, 2020, 5:10 PM IST
#जीवनसंवाद: मैं ही क्‍यों!
#जीवनसंवाद: मैं ही क्‍यों!

Jeevan Samvad: हमें अपनी अच्‍छाई को उसी तरह बचाना है, जैसे फूल मधुमक्खियों के लिए रस संचित करते हैं. संघर्ष की धूप को यह अनुमति मत दीजिए कि वह स्‍वभाव को कसैला बना दे.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 5:10 PM IST
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जीवन में कोई अप्रिय पल, संकट आते ही हमारा सबसे पहला सवाल यही होता है, मैं ही क्‍यों! ऐसा मेरे साथ ही क्‍यों होता है. ऐसा सोचते हुए हम भूल जाते हैं कि हम जब सुख की नदी के तट पर थे, तो हमने कभी यह नहीं कहा कि ‘मैं ही क्‍यों’.

हमारे सामने आने वाले प्रमुख संकट अक्‍सर रिश्‍तों के तनाव, एक-दूसरे से मतभेद, अलगाव, नौकरी में उतार-चढ़ाव, माता-पिता के नहीं समझे जाने, बच्‍चों की ओर से मिलने वाली उपेक्षा से जुड़े होते हैं. असल में हम सबसे अधिक टूटते उन्‍हीं रिश्‍तों से हैं, जिनसे गहराई से जुड़े होते हैं. हम दुनिया का तनाव सह लेते हैं, लेकिन परिवार, पति/पत्‍नी, माता-पिता की जरा सी कड़वी बात हमसे बर्दाश्‍त नहीं होती. किसी से धोखा मिला. कोई अवसर दूसरे को मिल गया. किसी ने छल किया. जन्‍म-जन्‍म का साथ निभाने की कसमों को एक छटके में कोई तोड़ गया. अब क्‍या करें. ऐसे में बहुत आसानी से मन को निराशा के भंवर घेर लेते हैं. इन भंवरों से जीवन की नाव को सावधानी से बचाना है.

मैं ही क्‍यों! ऐसा मेरे साथ ही क्‍यों होता है. इसके लिए एक छोटी-सी कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूं. इसमें जीवन से सरल संवाद है. ऊर्जा, प्रेम और समर्पण है.

आर्थर ऐश का नाम दुनिया के मशहूर टेनिस खिलाड़ियों में शुमार है. वे अमेरिका के पहले और एकमात्र ब्लैक (श्वेत) खिलाड़ी थे, जिन्होंने तीन ग्रैंड स्लैम खिताब- विम्बलडन, यूएस ओपन और ऑस्ट्रेलियन ओपन जीते थे. इसके अलावा वे अमेरिका के पहले ब्लैक खिलाड़ी थे, जिन्हें डेविस कप की टीम में भी जगह दी गई थी. 1983 में ऐश के हृदय की सर्जरी हुई. इसमें जो रक्‍त दिया गया वह संक्रमित था, इससे उन्‍हें एड्स हो गया. यह खबर सुनते ही दुनिया भर में उनके प्रशंसक दुखी हो गए. इसी दौरान एक प्रशंसक ने आर्थर को एक चिट्टी लिखी. इसमें उन्होंने पूछा, ‘ऐसी खराब बीमारी के लिए भगवान ने आपको ही क्यों चुना?’


इसके जवाब में आर्थर ऐश अपने विंबलडन खिताब का उदाहरण देते हुए लिखते हैं-

'दुनिया भर में 5 करोड़ लोग टेनिस खेलते हैं, इसमें से 50 लाख लोग टेनिस खेलना सीख पाते हैं. 5 लाख लोग प्रोफेशनल टेनिस सीखते हैं, 50 हज़ार लोग अलग-अलग टूर्नामेंट तक पहुंच पाते हैं. इसमें से 5 हजार लोग ग्रैंड स्लैम तक पहुंचते हैं. इसके बाद सिर्फ 128 लोग विम्बलडन में पहुंच पाते हैं, जिसमें से 4 लोग सेमीफाइनल तक पहुंचते हैं और फिर 2 फाइनल तक. सिर्फ एक विजेता हो सकता है. जब मैं ट्रॉफी के साथ खड़ा था तो मैंने भगवान से कभी नहीं पूछा कि मैं यहां क्यों? आज मैं इस बीमारी से दर्द में हूं तो भगवान से क्यों कहूं, आखिर मैं क्यों? खुशी आपको अच्छा बनाती है. परीक्षा आपको मजबूत बनाती है. निराशा आप में मानवता बनाए रखती है. असफलता आपको विनम्र बनाए रखती है. सफलता आप में चमक बरकरार रखती है, लेकिन सिर्फ विश्वास और दृष्टिकोण (एटीट्यूड) आपको आगे बढ़ाते हैं.’

6 फरवरी 1993 को आर्थर ऐश नहीं रहे. लेकिन उनके यह शब्‍द दुनिया के लिए प्रेरणा बन गए. खेल से विदा लेने के बाद आर्थर ने अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के जरिये मानवाधिकार, सेहत और शिक्षा के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान दिया. 20 जून 1993 को मरणोपरांत राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उन्हें मैडल ऑफ फ्रीडम से सम्मानित किया.

आर्थर के इस दृष्टिकोण की इस समय हमें सबसे अधिक जरूरत है. असल में हम दुनिया/प्रकृति/ईश्‍वर से शिकायत उसी समय करते हैं, जब हमारे हिस्‍से में कुछ तकलीफ आ जाती है. कुछ गड़बड़ हो जाती है. तभी शिकायत के अध्‍याय आरंभ होते हैं. आर्थर ने अपने दृष्टिकोण से नया रास्‍ता चुना.

फूल कभी तेज़ धूप की शिकायत नहीं करते. तूफान से मन कड़वा नहीं करते. वह खिलते हैं. अपनी जड़ों से ऊर्जा लेकर. वह दुनिया के लिए अपना स्‍वभाव नहीं बदलते. वह सुगंध भी बांटते हैं, रस भी. लेकिन उनसे कुछ लेने की कला, सबके भीतर नहीं होती.

मधुमक्‍खी में ही यह हुनर होता है कि वह उनसे रस लेकर शहद बना सके. हमें अपनी अच्‍छाई को उसी तरह बचाना है, जैसे फूल मधुमक्खियों के लिए रस संचित करते हैं. संघर्ष की धूप को यह अनुमति मत दीजिए कि वह स्‍वभाव को कसैला बना दे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: February 6, 2020, 12:25 PM IST
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