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#जीवनसंवाद: मन का कचरा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 2:37 PM IST
#जीवनसंवाद: मन का कचरा!
#जीवनसंवाद: मन का कचरा!

Jeevan Samvad: अधिकांश माता-पिता बच्चों से अपने माता-पिता के व्यवहार का बदला लेते हुए नजर आते हैं. अपने बच्चों के साथ वही क्रूरता, रूखापन और कठोरता जो उनके साथ की गई थी. यह मन में भरे उस कचरे का ही परिणाम है, जिसकी सफाई की तरफ किसी का ध्यान नहीं है.

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  • Last Updated: February 14, 2020, 2:37 PM IST
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हम घर का कचरा निरंतर साफ करते रहते हैं. शरीर का हर दिन. इन सबके बीच अगर कुछ छूट जाता है तो वह है मन. मन के ऊपर भार बढ़ता ही जाता है. धीमे-धीमे उम्र बढ़ती रहती है. तरह-तरह के अनुभव हमें गढ़ते रहते हैं. अगर मन की सही तरह से देखभाल ना की जाए तो उस पर भार बढ़ता रहता है. स्मृतियां, टूटे दिल के तार, अधूरे वायदे, नाराजगी, मन मुटाव, अहंकार का वजन शरीर के मुकाबले मन पर अधिक भारी पड़ता है. मन की उपेक्षा, उसके पोषण में कमी जीवन रस को इतना प्रभावित कर देती है कि हम स्वयं से दूर होते जाते हैं.

यह सारी प्रक्रिया मन को कूड़े घर मेंं बदल देती है. हम अक्सर दूसरोंं के सरीखे ही दिखना चाहते हैं. सब जैसा कर रहे हैं, सब कुछ उसी तरह हम भी करना चाहते हैं. सब बचपन से स्कूल में अच्छे नंबर लानाा चाहते हैं. हम भी यही चाहते हैं. सब बढ़िया नौकरी, मकान और ऐश्वर्य की इच्छा रखते हैं. हम भी ऐसा ही सोचते हैं. यह स्वाभाविक तो हो सकता है लेकिन इसके बीच सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह है कि हम तेजी से नकलची बंदर में बदलते जा रहे हैं. टेलीविजन पर जब से रियलिटी शो आए हैं, बच्चों की इच्छाएं कहीं पीछे छूट गई हैं. अब माता-पिता की इच्छाएं बच्चों के कंधेेे पर सवार होकर निकल पड़ी हैं. हम बच्चोंं के साथ जिस तरह का अन्यायपूर्ण, हिंसक व्यवहार करते हैं, वैसा व्यवहार शायद ही कोई दूसरा प्राणी (जिसमेंं प्राण हैं, जीवन है) करता हो.

हमारे सोचने समझने की पूरी प्रक्रिया ही केवल और केवल भौतिक सुख संसाधनों से घिरी हुई है. हमारे दिमाग में एक व्यवस्था बनी हुई है. जिसमें बच्चा सबसे सरल उपकरण है खुद को स्वामी साबित करने का. दुनिया के अधिकांश माता- पिता अपने बच्चों के साथ वही करते हैं जो उनकेे माता- पिता उनके साथ करते थे. और जिसे वह स्वयं नापसंद करते थे. अधिकांश माता-पिता बच्चों से अपने माता-पिता के व्यवहार का बदला लेते हुुुए नजर आते हैं. अपने बच्चों केे साथ वही क्रूरता, रूखापन और कठोरता जो उनके साथ की गई थी. यह मन में भरे उस कचरे का ही परिणाम है, जिसकी सफाई की तरफ किसी का ध्यान नहीं है.



कचरे और गंदगी के साथ सबसे दिलचस्प बात यह होती है कि अगर आप लंबे समय तक उस वातावरण में रहने के अभ्यस्त हो जाएं तो रोज-रोज यह बात आपको परेशान नहीं करती. बल्कि यह भी होता है कि आपका मन धीरे-धीरे वहां के अनुकूल अपने आप को कर लेता है. असल में शरीर के बस में कुछ भी नहीं है, सब कुछ मन ही है. अगर वहां कचरा पड़ा हुआ है तो उसका असर संपूर्ण जीवन प्रक्रिया पर दिखेगा. अब यह बात और है कि हम कचरे को भांपकर मन की सफाई करें अथवा शरीर में ही उलझे रहें.

क्रिकेट में बल्लेबाजी के दौरान एक बड़ी अहम चीज होती है- किसी खिलाड़ी का फुटवर्क ! सचिन तेंदुलकर कहते हैं, अगर बल्लेबाज मानसिक रूप से सही नहीं सोच रहा है, तैयार नहीं है तो उसका फुटवर्क (बल्लेबाजी के लिए पांव का संचालन) सही नहीं हो सकता. अगर आपका मन मजबूत नहीं है तो पांव भी ठीक से नहीं चलेंगे! मन की मजबूती हर जगह एक जैसी महत्वपूर्ण है, भले ही वह क्रिकेट का मैदान हो या उतने ही रोमांच से भरपूर हमारा जीवन!

सचिन की यह बात क्रिकेट जितनी ही जीवन के लिए भी सटीक है. हम जैसे दिख रहे होते हैं, उसका आधार हमारा शरीर न होकर मन होता है. मन की मजबूती हमें जीवन में अनेक दुखों और कष्टों से बचा सकती है. लेकिन यह मन मजबूत होगा कैसे. शरीर के आकर्षण और दुनिया की नकल के बीच हमारे मन का स्वास्थ्य निरंतर नीचे की ओर जा रहा है. मन पर परत-दर-परत कचरा जमता जाता है, और हमारा ध्यान उसकी ओर बिल्कुल ही नहीं रहता. इसलिए, मन की सफाई और उसकी सेहत की तंदुरुस्ती के लिए कदम उठाइए.हर दिन थोड़ा-थोड़ा समय स्वयं को देना आरंभ कीजिए. सबके जैसा होने से केवल शरीर प्रसन्न हो सकता है, मन नहीं. मन का ठोस और मजबूत होना उसके पोषण से ही संभव है. उसे कमजोर और बात-बात पर रूठने से बचने वाला बनाइए. मन की मजबूती जीवन को वहां ले जाने की क्षमता रखती है, जहां तब आपका पहुंचना जीवन के सौंदर्य के लिए जरूरी है. जिंदगी को सफलता से अलग देखने का नजरिया जिसने हासिल कर लिया उसे कोई दुखी नहीं कर सकता.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 10, 2020, 8:59 AM IST
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