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#जीवनसंवाद: अवसाद… अमेरिका और हम!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 16, 2020, 10:28 AM IST
#जीवनसंवाद: अवसाद… अमेरिका और हम!
#जीवनसंवाद: अवसाद… अमेरिका और हम!

Jeevan Samvad: हमें इस बात को सबसे अधिक समझने की जरूरत है कि बैंक बैलेंस, आर्थिक स्थिति को हमने जरूरत से अधिक महत्‍व दे दिया है. धन केवल हमारी सुविधा में वृद्धि करता है. उसमें हमें सुखी करने की क्षमता नहीं है.

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  • Last Updated: January 16, 2020, 10:28 AM IST
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हमारे मन में अमेरिका सुख के पर्यायवाची के रूप में बैठा है. हम बात-बात में वहां जाने, पढ़ने और बसने के सपने देखने वाला समाज रहे हैं. अमेरिकन समाज की संपन्‍नता, लोकतांत्रिक मूल्‍य हमें आकर्षित करते रहे हैं. अमेरिका को लेकर भारतीयों में गहरी दिलचस्‍पी रही है. इसके पीछे यह भाव भी रहा कि वहां संपन्‍नता होने से जीवन अधिक सुखी है. जबकि यह सिक्‍के का केवल एक पहलू है. हम आज अमेरिकन समाज की जीवन शैली में आ रही गंभीर चुनौती पर संवाद करेंगे. इस बहाने हम जीवन में धन के कहीं अधिक बताए, समझाए गए महत्‍व पर भी बात होगी.

हमें इस बात को सबसे अधिक समझने की जरूरत है कि बैंक बैलेंस, आर्थिक स्थिति को हमने जरूरत से अधिक महत्‍व दे दिया है. धन केवल हमारी सुविधा में वृद्धि करता है. उसमें हमें सुखी करने की क्षमता नहीं है. अगर ऐसा होता तो हर वह व्‍यक्ति जिसके पास पर्याप्‍त रकम है, वह सुखी होता. अगर ऐसा होता तो ऐसे तमाम लोग भला आत्‍महत्‍या क्‍यों करते, अवसाद की ओर क्‍यों बढ़ते, जिनके लिए धन समस्‍या नहीं है.

बीते रविवार को कुछ वर्ष पहले भारत की सबसे प्रतिष्‍ठत परीक्षा मानी जाने वाली, आईएएस में चयनित और इस समय इंदौर में सेवारत एक अफसर से जीवन पर विस्‍तार से संवाद हुआ.

उनके एक वरिष्‍ठ साथी जो मुझसे ‘जीवन संवाद’ से जुड़े, उनके सुझाव पर बातचीत हुई. इंदौर में काम करने वाले यह अफसर पिछले कुछ समय से जीवन के नकारात्‍मक प्रश्‍नों से घिरे हुए हैं. आपको यह जानकर आश्‍चर्य हो सकता है कि जिस व्‍यक्ति को समाज की समस्‍या सुलझाने का काम दिया गया है, वह अपने जीवन, रिश्‍तों के छोटे-छोटे घुमावदार मोड़ पर लगभग हताश हैं. वह एक माह के अवकाश पर हैं.


उनकी आवाज में निराशा, गहरी उदासी बैठी है. उनको लगता है कि उनके समीप कोई ऐसा नहीं जो उनका ख्‍याल रखे. जिनके लिए उन्‍होंने दुनिया से लोहा लिया, वह भी उन्‍हें भुलाए बैठे हैं. यह जिंदगी उन्‍हें कैसी जगह ले आई, जब वही उनका साथ नहीं दे रहे, जिनके साथ उन्‍होंने जीवन की सबसे मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया था.


असल में जिंदगी का यह रोमांचक मोड़ होता है. सबके जीवन में कभी न कभी आता ही है. हम उनसे नहीं हारते, जिन्‍हें शत्रु समझते हैं. हमारा मन उनसे ही चोटिल होता है, जि‍नके लिए मन में गहरा अनुराग होता है. आपको यह बताते हुए गहरा संतोष है कि तनाव से घिरे इस युवा अफसर को ‘जीवन संवाद’ के चुनिंदा लेख पढ़ने से मदद मिली. उनके वरिष्‍ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है.जब इन अधिकारी से बात हो रही थी तो इनका कहना था कि उनके लिए पैसा समस्‍या नहीं है. असली बात है रिश्‍तों से मिला छल. जीवन से मिली पीड़ा को सहने की क्षमता न होना.

अब एक नजर अमेरिका के अखबार, मीडिया में छपे उन आंकड़ों पर, जिन्हें देखकर सबसे अध‍िक चिंता होती है. इनके माध्‍यम से हम यह तो आसानी से समझ सकते हैं कि कम से कम वहां डिप्रेशन पर बात तो हो रही है. सब तरफ चिंता को समझा जा रहा है. उससे लड़ने की तैयारी हो रही है. जबकि अपने देश में इसे संकट मानने को भी समाज, सरकार तैयार नहीं हैं.

आप भी अमेरिकी मीडिया में छपे आंकड़ों पर नजर डालिए. साथ ही उन बातों पर भी, जिन पर अपने समाज, परिवार के नजरिए से भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है-

-अमेरिका में 2007 से 2017 के बीच 12 से 25 साल के लोगों की आत्महत्या की दर में 56 फीसदी की वृदि्ध हुई. हर रोज 16 किशोर आत्महत्या कर रहे हैं.

-दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के बाद आत्महत्या किशोरों की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है.

-आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा है, लेकिन महिला और पुरुष के बीच अंतर कम होता जा रहा है.

-इसी अवधि में इसी आयुवर्ग यानी 12 से 25 साल के युवाओं में डिप्रेशन के मामले में भी 63 फीसदी का इजाफा हुआ.

-कुछ विशेषज्ञ इसकी वजह सोशल मीडिया एक्सपोजर और स्मार्ट फोन के उपयोग को बता रहे हैं.

-लड़कियों को स्मार्टफोन के इस्तेमाल के कारण सोशल मीडिया पर साइबरबुलीइंग का शिकार होना पड़ रहा है.

-अच्छी बात यह है कि साइकोथेरिपिस्ट और दवाएं उपलब्ध हैं.

-जरूरत लोगों में इसके लक्षण पहचानकर सही व्यक्ति तक उपचार के लिए भेजने की है.

-अभी बहुत कम लोग उपचार या परामर्श के लिए जा रहे हैं.

-अभिभावकों को इस मामले में जागरूक करने के लिए जनआंदोलन चलाने की जरूरत है.

मैं आपको इस आखिरी बात पर ध्‍यान देने का अनुरोध करूंगा. अभिभावकों को इस मामले में सबसे अधिक जागरूक करने की जरूरत है. यह हमारे यहां अमेरिका के मुकाबले कहीं अधिक गहरा संकट है. जब तक माता- पिता डिप्रेशन, तनाव और निराशा को नहीं समझेंगे. हम समाधान से बहुत दूर रहेंगे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: January 15, 2020, 11:57 AM IST
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