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#जीवनसंवाद : पागल कौन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 9, 2020, 10:33 AM IST
#जीवनसंवाद : पागल कौन!
जीवन संवाद

इस कहानी के जिंदगी के लिए दो ही मायने हैं. पहला अपने सही होने पर भरोसा रखना. दूसरा, अगर दूसरे संकट में हैं तो उनकी ओर से मुंह नहीं मोड़ना. जीवन के अस्तित्‍व की यही कहानी है. हम इस पर भरोसा रखकर खुद को अनेक मुश्किलों से बचा सकते हैं.

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  • Last Updated: January 9, 2020, 10:33 AM IST
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हम अक्‍सर एक-दूसरे को पागल कहते रहते हैं. हमारे लिए वह पागल हुआ जो हमारी बात नहीं सुनता, समझता. जो हम कह रहे हैं उसमें उसकी आस्‍था नहीं होती. इसलिए हमें लगता है कि जो हमारी गति, मन, चिंतन के अनुसार नहीं चल रहा है, वह सही नहीं है. जो हमारे हिसाब से सही नहीं, वह कितना ही भला क्‍यों न हो, हम उसे पागल ही कहते हैं.

इसलिए हर किसी के लिए पागल की सूची अलग-अलग होती है. हमें कौन किस सूची में रखता है, इससे कहीं अधिक यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि हम खुद को किस सूची में रखते हैं. हमारी अपनी नजर कितनी साफ, स्‍पष्‍ट और सरल है.

मन जितना बेकार की चीज़ों से दूर रहेगा, वह उतना ही महकेगा. साफ मन किसी भी दूसरी चीज़ के मुकाबले हमारे लिए सबसे बड़ी चीज़ होनी चाहिए.


आज एक छोटी-सी कहानी पागल होने को लेकर.

बात जऱा पुरानी है. एक गांव में एक जादूगर आया. कहते हैं, वह गांव वालों से किसी बात पर नाराज हो गया. दुखी हो गया. उसने वहां से जाते हुए कुएं के पानी में कुछ ऐसा मिला दिया, जिससे जो उसे पीता, उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता. गांव वालों को कुछ दिन बाद यह बात पता चली. उन्‍होंने सोचा, इसका पानी नहीं पिएंगे. आसपास के गांव से पानी मंगाया गया. लेकिन कितने दिन? कुछ दिन दूसरे गांव के लोगों ने अपना पानी देना बंद कर दिया.


उनको लगा, वहां संकट है. हमें क्‍या करना! हमें उधर जाना नहीं. अपना पानी बचाइए. ऐसे में मजबूरी में गांव वालों को कुएं का पानी पीना पड़ा. देखते-देखते सारे पागल हो गए. अब सब एक जैसे, उनके बीच में कोई विवाद नहीं. पागल असल में वह है, जो हमसे अलग है. जो सबके जैसा है, उसे कोई संकट नहीं होता.धीरे-धीरे इस गांव के पागलों ने दूसरे गांवों पर कब्‍जा कर लिया, क्‍योंकि इनको लगता था कि दूसरे पागल हैं. इनकी बात नहीं समझते. धीरे-धीरे राजा तक बात पहुंची. उसके मंत्रियों ने किसी समाधान की जगह सबसे पहले अपने महल, राजभवन के कुओं पर पहरा बैठा दिया. उसे डर था कि उसके पानी पर कोई आक्रमण न कर दे. मंत्रियों ने कहा, हमारा पानी सुरक्ष‍ित है. उसे कोई डर नहीं. इसलिए चिंता की कोई बात नहीं.

राजा ने प्रजा के पानी का खयाल किए बिना अपने कुओं पर ध्‍यान दिया. उसे यह खयाल न रहा कि उसके अपने कुओं को बचाने भर से कुछ नहीं होगा. उसका पानी के सुरक्षित रहने से उसका कुछ नहीं होगा. उसे तो अपनी जनता के पानी की चिंता करनी चाहिए.

धीरे-धीरे हुआ यह कि एक दिन सारे पागलों ने महल को घेर लिया. क्‍योंकि उनको लगता था कि राजा पागल है. वह उनके हिसाब से काम नहीं कर रहा है. राजा को लगता था कि जनता का दिमाग ठीक नहीं. पागल जनता को लगा कि राजा को अपने हिसाब से ठीक करना चाहिए.

अब क्‍या करें! सेनापति ने कहा, महाराज बस एक ही रास्‍ता है. हम सब भी चलकर उनके कुओं का पानी पी लेते हैं. राजा ने उसकी बात मान ली. महल को घेरे बैठी जनता ने कहा, अब ठीक है. राजा हमारे जैसा ही है. हमारा ही है.

इस कहानी की जिंदगी के लिए दो ही मायने हैं. पहला अपने सही होने पर भरोसा रखना. दूसरा, अगर दूसरे संकट में हैं तो उनकी ओर से मुंह नहीं मोड़ना. जीवन के अस्तित्‍व की यही कहानी है. हम इस पर भरोसा रखकर खुद को अनेक मुश्किलों से बचा सकते हैं.

हमें इस बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि जो हमारी दिशा, गति, विचार के अनुसार नहीं चल रहे हैं. जरूरी नहीं, उनका फैसला हमेशा गलत हो.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: January 8, 2020, 12:32 PM IST
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