#जीवनसंवाद: जिंदगी प्रेम का 'कम' होते जाना!

हम सब अपनी 'बुनी' दुनिया में रहते हैं. वैसे ही जैसे बया अपना घोंसला बुनती है. हर तिनका उसके दिल के करीब होता है, फिर भी किसी एक से उसे ख़ास प्रेम होता है.

News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 3:54 PM IST
#जीवनसंवाद: जिंदगी प्रेम का 'कम' होते जाना!
हम सब अपनी 'बुनी' दुनिया में रहते हैं. वैसे ही जैसे बया अपना घोंसला बुनती है. हर तिनका उसके दिल के करीब होता है, फिर भी किसी एक से उसे ख़ास प्रेम होता है.
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Updated: August 7, 2019, 3:54 PM IST
किसी से बहुत नाराज होने का अर्थ है, उससे उतना ही गहरा प्रेम था. कमीज जितनी सफेद हो, दाग उतना ही गहरा दिखता है! इसलिए उसे जाने में कुछ समय लगता है. कितना समय, यह ठीक- ठीक कह पाना किसी के बस में नहीं! हम सब अपनी 'बुनी' दुनिया में रहते हैं. वैसे ही जैसे बया अपना घोंसला बुनती है. हर तिनका उसके दिल के करीब होता है, फिर भी किसी एक से उसे खास प्रेम होता है. इस प्रेम की कोई परिभाषा नहीं है, यह बस होता है. अनजानी चीजों से शुरू होकर कहां खत्म होगा, कहां तक जाएगा हमें क्या मालूम!

इन दिनों 'डियर जिंदगी' को प्रेम संबंध, रिश्तों, परिवार के तनाव के बारे में बड़ी संख्या में सवाल मिल रहे हैं. इनमें से कुछ के जितने संभव हैं, जवाब भी दिए जा रहे हैं. बहुत सी बातें जिंदगी की ऐसी जटिल गलियों के बारे में हैं जिनका समाधान बहुत दूर बैठे व्यक्ति से तलाशना संभव नहीं. इसलिए बहुत जरूरी है कि हम मन के दर्पण को साफ करते रहें, जिससे हम खुद चीजों को अधिक से अधिक स्पष्टता, सरलता के साथ देख सकें. ‌ ‌‌‌

किसी भी रिश्ते को भुला देना, एक झटके में उससे बाहर आना संभव तो है लेकिन सरल नहीं. स्वाभाविक भी नहीं! जैसे एक दिन में कुछ भी बनता नहीं, वैसे ही बिगड़ने के बाद भी कुछ मिटता नहीं! आत्मा पर पड़े सुर्ख निशान शरीर पर तो दिखाई नहीं देते, लेकिन वह अपनी अमिट छाप के साथ मौजूद रहते हैं. उनकी यह छाप हमारी जिंदगी किस दिशा में मोड़ रही है उस पर नजर रखना अनिवार्य है.

मनुष्य स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी जरूर है, लेकिन यह सामाजिकता से अधिक अब तक अस्तित्व का प्रश्न था. हमने साथ रहना इसलिए शुरू नहीं किया कि हमें साथ भाता था, बल्कि इसलिए क्योंकि यह साथ सुरक्षा देता था. खतरों से बचने का वायदा था. करार था.

जरा ध्यान दीजिए, पिछले पचास वर्ष में हमारी जरूरतें काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं. गांव या तो खाली हो रहे हैं या कस्बों में बदल रहे हैं, कस्बे शहर में बदल रहे हैं. मनुष्य प्रकृति पर अपनी अधिकतम विजय के निकट है.

हमने उन लक्ष्यों को लगभग हासिल कर लिया, जिनके लिए हमने साथ रहना शुरू किया था! हम साथ क्यों रह रहे थे, इसीलिए न क्योंकि हमें प्रकृति की ओर से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने में सहायता मिलती थी. अब उन सारी चुनौतियां से लड़ने के लिए एक 'सिस्टम' बन गया है. अब हमें शिकार की जरूरत नहीं, कोई राजा अचानक से हमला नहीं करता. कोई कबीला अनायास हम पर टूट नहीं पड़ता. जंगल से कोई आफत अचानक गांव पर नहीं आती.


इन कड़ियां को मिलाते जाएंगे तो पाएंगे कि यह सब अब अप्रासंगिक हो चली हैं. कृषि आधारित व्यवस्था अब अपने अंतिम दौर में है. खेती किसानी के लिए बहुत सारे लोगों की जरूरत होती थी. अब खेती-किसानी ही अंतिम सांसें ले रही है. उसके लिए अब मनुष्य की जगह मशीन हाजिर है. तो अब हमारी सामाजिकता किन चीजों पर टिकी रहेगी! क्योंकि हमें एक-दूसरे से जोड़ने वाली बुनियादी चीजें धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं. इसलिए, हम अकेलेपन की 'नई दुनिया' में प्रवेश करने जा रहे हैं.
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समाज में एक-दूसरे पर निर्भरता बुनियादी चीज है, जैसे -जैसे यह खत्म होती जाएगी, हमारे बीच का प्रेम भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता.

'डियर जिंदगी' के अगले अंकों में हम 'प्रेम और जीवन' के समक्ष नई चुनौतियों पर संवाद जारी रखेंगे. तब तक के लिए बस इतना कि स्वतंत्रता नई दृष्टि से देखने, समझने की जरूरत है. आर्थिक आजादी जीवन का एक छोटा सा हिस्सा भर है, बहुत अधिक महत्व देना मनुष्य और मनुष्यता दोनों के लिए सुखद नहीं है. रिश्ते, प्रेम, उदारता, आत्मीयता यही जीवन के मूल सूत्र हैं!

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद) Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: August 7, 2019, 3:54 PM IST
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